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Monday, 3 August 2026

भाजपा का कांग्रेस-काल | Datia & Bankipur By-election Results

चाहे कितनी भी बुलन्दी पे चला जाए कोई, आसमानों से उतारे तो सभी जाएँगे।

-शकील आज़मी।

बात 1980 की है। जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने देशभर में बहुमत हासिल कर सत्ता में अभूतपूर्व वापसी की थी। भारतीय राजनीति की आयरन लेडी कही जाने वाली इंदिरा गांधी का विजयी रथ अपने पूरे दम-ख़म के साथ दौड़ रहा था। और इसी तारतम्य में वह जून 1980 को अविभाजित मध्यप्रदेश पहुँचा। यहाँ कांग्रेस ने 320 में से 246 सीटें जीतीं और एक नया इतिहास स्थापित किया।

विपक्ष को हराने के बाद अब बारी अंदरूनी संघर्ष की थी। चुनाव जीत चुकी कांग्रेस से दो धड़े सामने आए। और दोनों के नेताओं ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावा पेश किया।(कांग्रेसी गुटबाज़ी कोई आज की बात नहीं। यह पार्टी के डीएनए में है।) एक गुट था धार जिले से आने वाले शिव भानु सिंह सोलंकी का। और दूसरा था विंध क्षेत्र के नेता अर्जुन सिंह का। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि उस वक़्त अधिकांश विधायकों का साथ शिव भानु सिंह सोलंकी के साथ था। लेकिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व - संजय गांधी और तत्पश्चात इंदिरा गांधी अर्जुन सिंह के पक्ष में थे। 

देश में सर्वथा शक्तिशाली कांग्रेस के आलाकमान की बात उस दौर में कोई नहीं टाल सकता था। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने ख़ुद शिव भानु सिंह सोलंकी को फ़ोन किया और आदेश दिया कि वो अपनी दावेदारी वापस ले लें। हुआ भी यही। विधायकों का समर्थन प्राप्त होने के बावजूद शिव भानु पीछे हट गए। और अर्जुन सिंह प्रदेश के बाहरवे मुख्यमंत्री बने।

जैसे-जैसे इंदिरा गांधी और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस मज़बूत होती गई। वैसे-वैसे उनका घमंड बढ़ता गया। सत्ता के मद में उन्होंने ऐसे कई फ़ैसले लिए - जिनका नतीजा वर्तमान में पार्टी भुगत रही है। कभी सर्वशक्तिमान रही कांग्रेस आज सिर्फ़ चार राज्यों में अपनी सरकार चला रही है। और उस दौर के एवज में आज उसके संसद नगण्य हैं। 

अब बात 2026 की। तीन अगस्त 2026 की। जब मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट और बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के चौंका देने वाले नतीजे सबके सामने हैं। भारतीय जनता पार्टी दोनों ही सीटों से अपना चुनाव हार गई। दतिया से पार्टी ने वरिष्ठ नेता और टिकिट के सर्वोच्च दावेदार नरोत्तम मिश्रा का टिकिट काटकर आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया। और बांकीपुर से भी एक अनसुने नाम को टिकिट सौंपा। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट हारकर भाजपा ने देशभर में अपनी किरकिरी करवा ली। कारण? वही 1980 वाला इंदिरा गांधी जैसे घमंड। अहंकार। अपने को सर्वेसर्वा समझने वाला चाल-चलन।

भारतीय जनता पार्टी का हालिया इतिहास उठाकर देखें तो हम पाएंगे कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लगातार क्षेत्रीय क्षत्रपों को बगल कर, अनजान नामों को आगे कर देता है। मीडिया इसे भाजपा का मास्टर स्ट्रोक बताती है। आख़िरी पंक्ति के कार्यकर्ता का सम्मान बताती है। लेकिन दरअसल ये शीर्ष आसान पर विराजमान इक्के-दुक्के नेताओं का घमंड है। उनकी आत्ममुग्धता है। उनका ये भरोसा है कि हम जिसके कंधे पर हाथ रख देंगे - वह विजयी हो जाएगा। 

मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को हटाकर, मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाना। वसुंधरा राजे को हटाकर, पहली बार के विधायक भजनलाल शर्मा को सीएम बनाना, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय को नेतृत्व सौंपना। गुजरात में पहले आनंदीबेन पटेल को, फिर विजय रुपाणी का इस्तीफ़ा लेकर भूपेंद्र पटेल को प्रदेश की कमान सौंपना - ये सभी भाजपा के वो फ़ैसले हैं जो कहीं न कहीं केंद्रीय नेतृत्व के अहंकार, उसकी आत्ममुग्धता और उसकी असुरक्षा को दर्शाते हैं। यही तो वह वजह है जिसके चलते कांग्रेस ने हर राज्य में अपने वफ़ादार तो खड़े किए, लेकिन कभी राज्य स्तर पर, निकाय स्तर पर मज़बूत नेता स्थापित नहीं कर सकी। नतीजन आज वह देश की सत्ता से कोसों दूर नज़र आती है। 

वर्तमान नतीजे बताते हैं कि भाजपा का कांग्रेसीकरण अपने चरम पर है। और उसके आलंबरदारों को अपने ही नेता, पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी की ये कविता अपने राष्ट्रीय दफ़्तर पर चस्पा करने की ज़रूरत है - “ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ़ बर्फ़, जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत की तरह ठंडी होती है।”


Friday, 16 May 2025

For Peace to Prevail, The Terror Must Die || American Manhunt: Osama Bin Laden



Freedom itself was attacked this morning by a faceless coward, and freedom will be defended.


-George W. Bush



Gulzar Sahab, in one of his interviews, was asked this once: “Do you think we have made enough films or written enough literature about the horrors of the India-Pakistan Partition?” He, being a victim of it himself, said, “No. We haven’t. And there won’t be enough ever.”


Films made, books written, art created around any horrifying historical incident never feel enough. Because one can never get over something that in one way or the other, changed the course of humanity, the course of history, and sometimes even the course of geography.


How many films? and I say honest, genuine, deeply felt films have we made on the 1993 serial bombings in Mumbai? How many films on the 2006 local train blasts? & How many on the heinous terror attack of 26/11? Less than a dozen I guess!


There are so many attacks, massacres, killings, genocides that we as a nation have faced, have suffered. But do we talk about them enough? No, we don’t. We feel as if just talking about terror is a threat to peace and humanity. You know what? It’s not. For Peace to Prevail, The Terror Must Die. And for the terror to die, it must be talked about fearlessly.


Think about the amount of literature and cinema that’s been made on and around Nazi cruelty. Think about what Americans have made continuously on the attacks of 9/11 and about Operation Neptune Spear. They talk about it almost every single year through their films, their writings, their shows - because they don’t want to forget what is considered to be the greatest tragedy they went through in modern history.


Netflix's Documentary American Manhunt: The Killing of Osama Bin Laden is the latest & exact example of the fact, I am talking about. A perfectly made documentary with detailed explanations on how American agencies, after a long wait of 15 years, found and killed Al-Qaeda’s supremo, wanted terrorist Osama Bin Laden.


There is a scene from a Shahrukh Khan starrer film Ra-One, where the character played by actor Arjun Rampal says this dialogue, and I quote: “Tum log Raavan ko har saal kyun jalate ho? Kyonki tumhein yakeen nahin hota ki vo mar chuka hai.”


It’s hard to gulp it down. But it is a fact that - “Till the time there is humanity, there will be terrorism.” But so will be the counters. The defense. The fightbacks. The attacks, the violence, the wounds, the scars, the pain they inflicted must not be forgotten, because if you do so you will start taking peace for granted. I recall a famous African proverb that says - "The axe forgets, but the tree remembers."


Peace, just like freedom, isn’t a one-time goal. It’s not eternal. It has to be achieved again and again and again. Its pursuit is perpetual. “Let everything happen to you. Beauty or terror. Just keep going. No feeling is final,” said the poet Rainer Maria Rilke. And I agree with him.


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Monday, 12 May 2025

My Mother’s Love Language



A few months ago, I was in a meeting with comic and poet Rajat Sood. I wanted to bring him in for an event, and we were brainstorming what kind of immersive experience we could create. That’s when he suggested his very own podcast show, Love Language. It was built around a Q&A model with guests and audience members, and it revolved around themes of love, relationships, breakups, and so on.

The event ended, but the title stayed with me—Love Language.

On another occasion, I was with one of my colleagues. While chatting over a cup of chai, she asked me, “What is your love language?”

I went blank. I had no answer to the question. (And I must tell you, I don’t like not knowing.)

“I don’t quite understand the term. Can you give a few examples?” I replied.

“When you love someone, you don’t just say it—you show it. Love is mostly about actions. And the ways in which you show your love to someone define your love language. It’s as simple as giving flowers to your loved ones, cooking for them, making a cup of tea, taking them to their favorite film or a place they love, or just being there for them all the time,” she explained.

I don’t know why—even after such a descriptive explanation—I still couldn’t grasp it. I didn’t understand what a love language truly was. What I did recall was this quote from The Dark Knight: “It’s not who I am underneath, but what I do that defines me.”

Until recently—when I got a WhatsApp message from my mother: “Mere phone mein balance daal dena.” 

Now, there’s a common practice in many middle-class families in second- or third-tier Indian cities: the eldest son is responsible for recharging the parents’ phones. My father calls me every month to remind me of this. But my mother never calls. She always texts. And it’s not just about a phone recharge. If it’s someone’s birthday in the family, she texts me and asks me to wish them. If there’s a festival, she messages and tells me to visit a temple.

I’ve never told her this, but she somehow knows I’m not a “call” person. I like texting. And maybe that’s a love language too—the best one of all. I now know what a love language is. But even today, I have no idea what mine is.


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Wednesday, 7 May 2025

हम भारत के लोग | Pahalgam Terrorist Attack & Operation Sindoor



विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।


-तुलसीदास


पहलगाम, कश्मीर में हुए कायराना आतंकी हमले के दो दिन बाद की बात है। मैं सुबह-सुबह दैनिक भास्कर अख़बार की एक ख़बर पढ़ रहा था। हमले में हमारे 26 नागरिक मारे गए थे - और यह रिपोर्ट उन सभी का ज़िक्र करते हुए लिखी गई थी। इसके एकदम आख़िर में हर एक शख़्स की तस्वीर थी, जिसके नीचे उनका और उनके राज्य का नाम था। फ़ेहरिस्त में - महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, हरयाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, पंजाब, केरल, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, आंध्र, अरुणाचल - सभी का नाम था। एक ही दिन, एक ही वक़्त पर, एक ही जगह - पूरा देश मौजूद था।


आज ठीक इस समय भी आप देश के चाहे किसी कोने में चले जाएं, आप पाएंगे कि कश्मीर की ही तरह वहां भी किसी न किसी नज़रिये से पूरा देश मौजूद है। भारत मौजूद है। अनेकता में एकता के नारे को अनवरत चरितार्थ करता ये अद्भुत देश - जिसका संविधान, जिसकी सेना, जिसके लोग, जिसकी संसद, जिसकी तमाम व्यवस्थाएं कुछ इस तरह एक दूसरे में गुथी हुई हैं, कि इनमें से किसी का भी बिखरना संभव नहीं है। यहाँ एक व्यवस्था के ऊपर दूसरी व्यवस्था है और दूसरी के ऊपर तीसरी। भारत वह वृक्ष है जिसके तने और जिसकी जड़ें - दोनों समान गति से बढ़ती हैं। हमें न उखाड़ पाना मुमकिन है, और न काट पाना। न आदि, न अंत।


विगत कुछ वर्षों में जो कुछ अफ़ग़ानिस्तान में हुआ, जो श्रीलंका में, और बांग्लादेश में हुआ - वैसा कुछ भी हमारे यहाँ नहीं हुआ। क्योंकि हमारी मान्यताएं, हमारी संस्कृति - सर्वधर्म सम्भाव की है। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति की है। वसुधेव कुटुंबकम की है। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरियसी की है। हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारी एकता(एकरूपता नहीं।), एकजुटता ही दहशतगर्दों के आँखों की किरकिरी है।


अखंडता प्रमाण है -- नींव संविधान है। संविधान जो भारत के अजेय रथ का सारथि है। संविधान जो बहुधा समस्याओं के बावजूद भी सुखद भविष्य की उम्मीद को मरने नहीं देता। संविधान जो हर नागरिक को शक्ति देता है, लेकिन किसी को भी सर्वशक्तिमान नहीं बनने देता। संविधान जो ख़ुद अपने में सुधार की सम्भावना को जीवित रखता है। संविधान जिसे जाति, धर्म, पंथ, समुदाय, राज्य, भाषा आदि सब कुछ दिखाई देता है। और इसलिए वह न्याय के ऊपर इनमें से किसी को नहीं रखता।


और संविधान जो कर्नल सोफ़िया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह की हिम्मत बनता है और उन्हें अपने देश की रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपता है। आज मुझको, आपको, हम सबको अपने प्यारे भारत पर, अपनी भारतीयता पर गर्व है। और ये गर्व सदैव अक्षुण्ण रहना चाहिए।


शेर महशर अफ़रीदी का है - ज़मीं पे घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं // हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं।

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Devil Will Follow You Home | Sinners | Movie Review




Years back I was in this screenwriting workshop with Satyanshu Singh(Writer, Director of critically acclaimed film Chintu ka Birthday) & while discussing various film writing structures he said: “It doesn’t matter what the end is. What matters is how you arrive at it."

Nicest example he gave was of the film “Dilwale Dulhaniya Le Jayenge” One knows right from the title that - “Dilwale Dulhaniya le jayenge”. But “Kaise le jayenge?” Nobody knows. Another example he gave was of Lagaan, where the audiences in their heart knew that Bhuvan & his team is gonna win the match. But they didn’t know - “How?”


The other day at a writing workshop by Rabia Kapoor, she enunciated the same thought. “Writing is all about the process and not the end result.”


There is no limit to how many Vampire, Zombie, Devil movies we have witnessed over the years. From “Walking Dead” to “Last of us” & “Train to Busan” to “All of us are dead” or “Cargo” & from “Vampire Diaries” to “Twilight” (When I am writing this I can’t stop thinking of the films “Hotel Transylvania” & “Zombieland“) — So many of them but each with a different narrative. With a signature of their own. Similar when seen from a wider angle but so different when seen in close up.


A visual treat set in Delta, Mississippi — “Sinners” wasn’t just a vampire movie to me. It was my introduction to a genre of music called “Blues”(something I knew nothing about) It was a window into the lives of African-Americans & hardships they faced. & into the Juke Joints they built as their hangout spaces. It was a lesson in being able to tell a story, even when you think it’s been told several times before. It in some weird unexplainable manner felt like a puzzle solved to me. A sigh of relief.


Because no matter how many times a tale is told. There will always be an unsaid perspective. Perspective that depends upon your answer to — “How?”


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Thursday, 30 December 2021

शिकागो धर्म संसद और वर्तमान विधर्मी संसदें।




मैं आए दिन अपने धर्म से जुड़ी, अपने ग्रन्थों, पुराणों से सम्बंधित निश्छल, आलोकिक, और अनूठी बातें पढ़ता हूँ। भजन, स्रोत, कथाएं सुनता हूँ। और कभी-कभी उन्हें गुनगुनाता हूँ, Recollect करता हूँ। यह सब करते हुए मैं हमेशा रोमांच, उल्लास और उजास से भर उठता हूँ। मन में हिलौर उठती हैं, "आज कुछ अच्छा जाना, कुछ सार्थक पढ़ा।" का विचार मन को प्रसन्न कर देता है।

और जब-जब ऐसा होता है, तब-तब मैं सोचता हूँ कि जो नितांत पाखण्डी, विभिन्न संचार माध्यमों से संसार के समक्ष मेरे धर्म के प्रतिनिधि बनते हैं, वे धर्म से किस क़दर दूर हैं। भ्रष्ट, कलुषित और समूचे नकारात्मक ये लोग आख़िर किस तरह "सनातन" की अगुवाई करने का दावा कर सकते हैं? यह सब बहुत निराशाजनक है। निंदनीय है। 

मेरे प्रिय दोस्तों - "धर्म।" - ये शब्द इतना बड़ा, इतना विस्तृत, विशाल है कि एक प्राप्त जन्म में इसकी संपूर्णता को समझा नहीं जा सकता, इस पर स्वामित्व नहीं पाया जा सकता। केवल और केवल इसका आनंद ही लिया जा सकता है। आप भी आनंद लीजिए। धर्म को अपने ह्रदय में स्थान दीजिए, और मस्तिष्क में अपने विवेक, अपने ज़मीर को। 

वर्तमान में कोई भी तथाकथित बाबा, साधु, सन्त, महंत, योगी, मौलवी, फ़ादर आपको आपके "विश्वास", आपकी "आस्था" के समीप नहीं ले जा रहा। ले जा ही नहीं सकता। वह आपको सिर्फ़ अपने स्वार्थ के हत्ते चढ़ाने की कामना रखता है। वह अपने पीछे भ्रमित, सम्मोहित और भयभीत लोगों की भीड़ खड़ी करना चाहता है। और ये हालात उन्हीं लोगों के हैं जो स्वयं को भगवान का मैसेंजर(संदेश वाहक।) मानते हैं। इनकी तो छोड़िए, हाल-फ़िलहाल में तो आप चंद सियासतदानों की, कुछ सियासी दलों की बातों में आने लगे हैं। ये वाक़ई दुखदायी है।

क्या अपने धर्म, अपनी आस्था, अपने आवरण को समझने के लिए आपको नेता, अभिनेता, सत्ताधीशों की आवश्यकता है? अगर हाँ, तो न-जाने आप किस सत्य की ओर बढ़ रहे हैं। बहरहाल, जिस भी ओर आप अग्रसर हैं, आपको मेरी शुभकामनाएं। आज के समय में रामकृष्ण परमहंस की कही एक बात को बार-बार उल्लेखित करने की आवश्यकता महसूस होती है  - "नदियां बहती हैं, क्योंकि उनके जनक - पहाड़, अटल हैं।"

मेरे "सनातनी" भाइयों - अपने विवेक, अपनी समझ और अपने भीतर उपजे विचारों से ही अपने जीवन के छोटे-बड़े फ़ैसले लीजिए। और अपने लक्ष्य, अपने स्वप्न, अपने सत्य की खोज में निश्चिंत, निस्संग और निर्भीक होकर बहिये। क्योंकि हमारा ईश्वर अटल है। जब कोई नितांत मूर्ख आपसे कहे कि आपका धर्म संकट में है, तब परमहंस जी की कही इस बात का स्मरण करें। और फिर वन में बैठे एक बाघ के बारे में सोचें, "बाघ सी निर्भयता।" के बारे में सोचें।

याद रखें हिन्दू मानस के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति और युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद की इस बात को, जिसका उद्घोष उन्होंने शिकागो की धर्म-संसद में किया था -

"अगर विश्व धर्म संसद ने दुनिया को कुछ दिखाया है तो वह यह हैः इसने दुनिया को यह साबित किया है कि शुचिता, पवित्रता और परोपकार पर दुनिया के किसी चर्च का एकाधिकार नहीं है और हर धर्म ने उदात्त चरित्र वाले पुरूषों और महिलाओं को जन्म दिया है। इस प्रमाण के बावजूद, यदि कोई यह सपना देखता है कि केवल उसका धर्म जिंदा रहेगा और अन्य धर्म नष्ट हो जाएंगे, तो मैं अपने दिल की गहराई से उस पर दया करता हूं। मैं उससे कहना चाहता हूं कि जल्दी ही विरोध के बावजूद, हर धर्म के झंडे पर यह लिखा होगा ‘मदद करो, लड़ो मत‘, ‘आत्मसात करो, विध्वंस न करो‘, ‘सौहार्द और शांति न कि कलह और मतभेद‘।‘‘

किसी स्वघोषित, ज़हरीली, भड़काऊ, और उन्मादी धर्म-संसद की बात सुनने से किसी का भला नहीं हो सकता। मानवता का तो कतई नहीं, कभी नहीं। जिस किसी को इस तरह की संसदों में अपना, अपने परिवार, अपने परिवेश, अपने समाज का उत्थान दिखाई देता है, उनके लिए शायर दुष्यंत कुमार के ये शेर प्रासंगिक हो जाते हैं -

"बाढ़ की संभवनाएं सामने हैं,
और नदियों के किनारे घर बने हैं।

जिस तरह चाहे बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं।।

सनातन हिन्दू धर्म का शाश्वत संदेश है - "स्वीकार्यता, संकीर्णता नहीं। Inclusivity, Exclusivity नहीं। मानवता, दानवता नहीं। प्रेम, घृणा नहीं।"

बाक़ी, जैसी जिस की सोच। सृष्टि की सीमा, हमारी दृष्टि की सीमा से कई अधिक असीम और अमाप है। है ना?

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Friday, 24 December 2021

शायरी में अंग्रेज़ी?



2017 की जनवरी या शायद फ़रवरी में जयपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन गुलज़ार साहब को मंच पर कविता की प्रोसेस(प्रक्रिया) के बारे में बात करते हए सुना। यही वह दिन, महीना, साल था जब उन्होंने अपनी किताब "A poem a day" का ज़िक्र पहली बार किया था। भारत में बोली जाने वाली लगभग हर ज़ुबाँ की कविताओं का एक संकलन, एक मजमुआ उन्होंने तैयार किया था। जिसे वे किताब की शक़्ल में पाठकों के बीच लाना चाहते थे। किताब में सभी भाषाओं से किये गए तर्जुमे छपने थे। वो किताब अब बाज़ार में मौजूद है। बाज़ार को "अमेज़न डॉट कॉम।" भी कह सकते हैं। 

"कविता सिर्फ़ एंटरटेनमेंट की चीज़ नहीं, वह अपने वक़्त को दर्ज करने का ज़रिया भी है।" - उन्होंने जेएलएफ के मंच से कहा था।

यह फेस्टिवल(उत्सव) का ओपनिंग सेशन(शुरुआती सत्र।) था। और इसके ख़त्म होते ही मैं साहित्य के इस मेले में लगे सबसे क्राउडेड स्पेस - "बुक स्टोर।" में दाख़िल हुआ। सभी किताबें चमकती थीं। पर मैं गुलज़ार की लिखी "संजीवनी।" लेने पहुंचा था। मैंने "Selected Poems." नाम की किताब ख़रीदी। दरअसल में "Neglected Poems." लेना चाहता था। मगर वह "आउट ऑफ स्टॉक" हो चुकी थी। अच्छे लोग, अच्छी किताबें - फ़टाफ़ट आउट ऑफ स्टॉक हो जाती हैं।"

बुक स्टोर के दायीं तरफ़ एक छोटा सा तालाब सा कुछ था। मैं उसके इर्द-गिर्द घुमावदार पाल पर बैठा और पहली 10-20 नज़्में वहीं पढ़ लीं।

मैंने महसूस किया कि नज़्मों में इस्तेमाल किया हर लफ़्ज़ मेरे आसपास का है। या कहना चाहिए कि अधिकतर अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिनकी आवाज़ मैंने पहले सुन रखी है। जिनकी frequency से मैं वाकिफ़ हूँ। गुलज़ार की भाषा, मुझे अपनी भाषा लगी। - "मुख-सुख।" की।

"आम आदमी ग्रामर की कमियों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता।" - राही मासूम रज़ा ने कुछ ऐसा कहा है। मुझे याद है। Eidetic memory.

जावेद अख़्तर का कथन है - "कठिन ज़बान में लिखना आसान है, आसान ज़बान में लिखना कठिन।"

Selected poems हो, green poems हो, neglected poems हो, या फिर रात पश्मीने की हो। गुलज़ार साहब की हर किताब में नज़्मों की ज़बान बोलचाल सी दिखी। या बोलचाल के क़रीब दिखी। अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल अपने लेखन में करने का सिलसिला मैंने वहीं से शुरू किया। इस "बीज।" की बुआई मुझ में वहीं दिग्गी पैलेस, जयपुर में पहली मर्तबा हुई।

फिर रस्किन बॉन्ड के लेखन में हिन्दी के शब्द देखता रहा। और निर्मल वर्मा की तहरीरों में अंग्रेज़ी शब्दावली की छाया दिखती रही।

मेरा लिखा "सबकुछ" - मेरे साहित्यिक पूर्वजों के लेखन से प्रेरणा-प्राप्त है। इंस्पायर्ड। मेरे पास "अपने पढ़े हुए।" की बैकिंग है। और अपने अनुभवों, अनुभूतियों और अदबी फ़ैसिनेशन का आधार है। "लेखन" के क्षेत्र में बढ़ाया गया मेरा हर क़दम किसी न किसी बड़े मुसन्निफ़/अदीब के दिखाए मार्ग पर ही होता है। क्योंकि मुझे इस बात पर पूरा    यकीं  है कि अगर मुझे कभी कोई अपनी तरह की यूनीक(वाहिद) लेखन शैली हासिल होगी, तो इन्हीं में से किसी रास्ते पर होगी, वरना नहीं। (बहर में शेर कहना भी इसी सिलसिला की एक राह है, जिसपर चलना मैं सीख रहा हूँ।)
 
कुछ लोगों" को हालिया या वर्तमान शायरी में शामिल अंग्रेज़ी हर्फ़ों से तकलीफ़ होती है। उन्हें लगता है जैसे किसी भाषा की हत्या हो रही है, अदब का क़त्ल हुए जा रहा है। जानते वे भी हैं कि - ज़बान और अदब/भाषा और साहित्य, किसी की सुरक्षा का मोहताज नहीं है। "भाषा अपनी रक्षा स्वयं कर सकती है." - 2017 के ही जयपुर साहित्य उत्सव में लेखक मानव कौल और गीतकार स्वानन्द किरकिरे ने यह बात संयुक्त रूप से कही थी। 

उन "कुछ लोगों" के सुझावों, उनकी सलाह, उनकी कुंठित और संकीर्ण मनोदशा/मानसिकता के सामने, के समक्ष पेश हैं कुछ कमाल के अशआर/नज़्मों के अज्ज़ा, जिनमें "English" के शब्द बड़ी सुंदरता और सफ़ाई के साथ प्रयोग में लिए गए हैं। मेरे द्वारा नहीं, बल्कि मुझ से बड़े सुखनवरों/नज़्मकारों द्वारा। पढ़िए -

देख ली आबो-हवा मैंने बदल कर जानेमन,
दाग़ सांसों से नहीं जाते तेरे "परफ़्यूम" के।।

-स्वप्निल तिवारी।

क्या रिश्ता है शामों से,
सूरज की क्या लगती हो।

किस ने "जींस" करी ममनूअ' 
पहनो अच्छी लगती हो।।

-अली ज़रयून।

कमाया जैसे उसी शान से उड़ाया भी,
कभी भी नोट पे हमने "रबर" नहीं बांधा।।

- शकील आज़मी।

बड़ी "अरिस्टोक्रेसी" है ज़बाँ में,
फ़क़ीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू।

-गुलज़ार।

अपनी शादी में छपाए उसने अंग्रेज़ी में "कार्ड"
वो जो हिन्दी बोलता था रोज़ के व्यवहार में।।

-उर्मिलेश।

रात की "टेबल" बुक करके,
चाँद "डिनर" पर बैठा है।।

-स्वप्निल तिवारी।

तुम्हारी "फाइलों" में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।

-अदम गोंडवी।

एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें, "माइक" रहे, माला रहे।।

-अदम गोंडवी।

आंखों का "वीज़ा" नहीं लगता है, 
सपनों की सरहद होती नहीं, 
बंद आंखों से रोज़ मैं -
सरहद पार चला जाता हूं।

-गुलज़ार।

अंत में मैं बस यही कहूंगा कि - "सब भाषा उन्नति अहे! सब उन्नति को मूल

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Saturday, 18 December 2021

हम जैसों की किताब क्या ख़ाक छपेगी।



16 दिसंबर 2021 

"Let everything happen to you. Beauty and terror. Just keep going. No feeling is final." - फ़िल्म जोजो रैबिट में सबसे पहले जर्मन कवि रिल्के की इन पंक्तियों को पढ़ा। और फिर निर्मल वर्मा के लेखों, निबंधों, संस्मरणों में इसी नाम का अनुरणन बार-बार सुनता रहा।

रिल्के की किताब "लेटर्स टू यंग पोएट्स।" में कहीं दर्ज है कि - एक बार एक युवा कवि से मुख़ातिब होते हुए रिल्के ने कहा - "रात की सबसे ख़ामोश घड़ी में ख़ुद से सवाल करो कि क्या लिखना अनिवार्य है? - जवाब हाँ में होना चाहिए अगर तुम अकेले रह रहे हो और तुम्हारे साथ/पास कोई नहीं जिसकी तरफ़ तुम मुड़ सको।"

2015 वह वर्ष था जब मैंने पहली बार यही सवाल अपने आप से पूछा था। बिल्कुल इन्हीं शब्दों के साथ तो नहीं, लेकिन इसी तरह के मिलते-जुलते शब्दों के साथ मैंने ख़ुद से सवाल किया था - "लिखते रहना है क्या?" मेरे अलावा इस सवाल को सुनने वालों में - चार झड़ती हरी दीवारें थीं, एक ग्रे टीन की छत थी, राइटिंग टेबल था, पलंग, लैपटॉप, पेन स्टैंड, गेस-चूल्हा, कुछ टीन के पीपे, कुछ स्टील के बर्तन, एक वीआईपी कम्पनी की अटैची(ट्रॉली बैग), कुछ किताबें और कई दिनों के कचरे से भरा डस्टबिन था।

नितांत सन्नाटे में जब अपनी आदत अनुरूप कोई कुछ नहीं बोला तब मेरे अंतर्मन से जवाब "हाँ" में आया था। और फिर उसके बाद से मैंने लेखन को कभी "ना" नहीं कहा। सृजन से इनकार नहीं किया। रचने से मुँह नहीं मोड़ा।

मुंबई के लोअर परेल स्थित दी कोरम क्लब में एक किस्सों, कहानियों, कविताओं और संगीत की महफ़िल के बाद हम डिनर करने बैठे, और साइमलटेनिअसली साहित्यिक बातचीत का एक लम्बा थ्रेड शुरू हो गया। हर कोई अपने से पहले बोल चुके व्यक्ति को टैग करके, उसकी बात के आगे अपनी बात जोड़ता चला जाता। और थ्रेड लंबी होती जाती। मुझे इस थ्रेड का वह बिंदु, वह पॉइंट, वह जोड़ याद आता है जहाँ महफ़िल में शामिल गीतकार और ग़ज़लकार स्वप्निल तिवारी ने लोकप्रिय साहित्य और फेमस आर्टिस्ट्स की बात करते हुए कहा था कि "ऐसे बहुत से शायर/लेखक/कवि हैं जिन्हें लिखते रहने के कई साल बाद पहचान मिली, यहाँ तक कि कुछ को तो कभी कोई रिकगनाइज़ेशन मिला ही नहीं लेकिन इसके बावजूद वे लिखते रहे क्योंकि उन्हें एक चीज़ लगातार मिलती रही - अच्छा, सार्थक और ईमानदार रचने की ख़ुशी। सृजन का सुकून।" बात बहुत दिखावटी लगती है।  कुछ-कुछ क्लिशे भी, मगर बात खरी है। 

मैंने लिखने या लिखते रहने का फ़ैसला अपने अंतर्मन से किया था। स्वाभाविक रूप से लेखक अंतर्मुखी होते हैं। - निर्मल वर्मा का कथन है।

पुश्किन की बात मानें तो - "एक कवि का कर्तव्य यही है, अच्छा लिखना। वह लिखना जिसके लिए भाषा उसे निर्देशित करती है। अगर वह ऐसा करने में समर्थ होता है तो उसका आत्मसंतोष ही उसे आगे का मार्ग दिखाएगा। और अगर असमर्थ होता है तो उसे पीड़ा सहनी होगी। पीड़ा, जो लेखन का प्रतिमान है।" मैं हमेशा से आत्मसंतोष के लिए लिखता आया हूँ। और जब-जब इससे अतिरिक्त लेखन से कुछ भी पाने के प्रयास किये हैं - मेरे हाथ पीड़ा ही लगी है। एक अजीब तरह का दुःख, जिसका कारण कोई पूछ ले तो हथेलियों में पसीना चिपकने लगता है।

"Writing is an art of letting things go." मैंने मानव कौल को पढ़ते हुए यह बात जानी थी, लेकिन कभी सीख नहीं पाया। "हम सब की अपनी एक ज़िद होती है। कुछ लोग कभी न कभी उसे छोड़ देते हैं, और कुछ अंत तक उसे अपने से चिपकाए रखते हैं।" - निर्मल वर्मा अपनी किताब "परिंदे" में कहते हैं। मेरा लेखन अधिकांश रूप से नॉस्टैल्जिया, स्मृतियों और "घट रहे" में "बीत चुके" को ढूंढ़ने में खप जाता है। ख़ुद को जस्टिफाय करने और अपना दुखड़ा रोने के अलावा मैंने अपने लेखन में शायद ही कुछ और किया है। और इसलिए निर्मल के शब्दों में - ख़ुद को लेखक कहना दम्भपूर्ण मालूम होता है। मैं अपने आप को कौन से प्रोफेशन के ब्रैकेट में डाल सकता हूँ? - एक अनुत्तरित प्रश्न है।

जुलाई की एक सुबह। खिड़की से सटकर रखे राइटिंग टेबल पर रखी अपनी डायरी के ऊपर अपनी दोनों कोहनियां टिकाए बैठा था। खिड़की के उस पार, पोर्च के आगे, "आगे" के आगे - घरों, बिल्डिंगों के भी आगे मैं पहाड़ों को देख रहा था। बस उनका शीर्ष दिखाई देता था - हल्की धुंध में नहाया हुआ। कुछ क्षण पहले ही फ़िल्म "इंटू दी वाइल्ड।" देखी थी। और "Happiness is only real, when shared." - यह संवाद मुझ पर कुछ हावी हो गया था। "अकेले रह जाने का डर।" - चुभ रहा था। नीचे से ऊपर की ओर - शरीर में सिहरन उठने लगी, आँसू निकलने लगे। और तभी मैंने अपनी डायरी में यह सब लिखना शुरू कर दिया। तब तक लिखा जब तक आँसू सूख नहीं गए। तब तक लिखा जब तक अपने भीतर उपजे भय को स्थगित नहीं कर दिया। और फिर उसके बाद एक लंबी साँस भीतर लेते हुए सोचा - "लिख सकता हूँ।" का ख़्याल इतना सुखद है। कि "लिखने के लिए पुरुस्कार मिलेगा।" का विचार ओछा, गैर-ज़रूरी, और छिछला मालूम होता है।"

हम अक्सर वास्तविक दुख को कल के लिए स्थगित कर देते हैं। और फिर हम उसे भूल जाते हैं। इस तरह हम दुःख से बच जाते हैं।

मेरी नज़र में लेखन कोई परोपकार का काम नहीं है। लिखने में लेखक के कई स्वार्थ निहित हैं। और मैं शुद्ध स्वार्थी हूँ। बीती 9 तारीख़(9 दिसंबर) को मेरा यह ब्लॉग "Prcinspirations." 6 साल का हो गया। संपर्क, संवाद और संचार के 6 साल। कविता, कहानी, आलेख, समीक्षा(फ़िल्म और बुक) के 6 साल। साहित्यिक, सिनेमाई और राजनीतिक लेखन के 6 साल। 6 सालों में इस ब्लॉग को सिर्फ़ 72000 बार पढ़ा गया है। अर्थात 1 साल में बस 12000 बार। मैं वायरल आर्टिस्ट/लेखक नहीं हूँ - स्पष्ट है। न कभी हमारी किताब छपेगी, न हमें 1 मिलियन यूट्यूब व्यूज़ मिलेंगे, और न हमें साहित्य के किसी मठ द्वारा आमंत्रित किया जाएगा

बावजूद इसके मैं लिखना नहीं छोड़ सकता। क्योंकि निर्मल की निश्छल वाणी मुझे अकेले अंधकार में अक्सर सुनाई पड़ती है - "यह भयानक है, जब लेखक लिखना बंद कर देता है। उसके पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं रहता, सिवा अपने चेहरे के।"

मगर क्या मैं वास्तव/वाक़ई में लेखक हूँ? एक और अनुत्तरित प्रश्न। एक और। Alas!

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Friday, 10 December 2021

एक होमसिक की डायरी।



9 और 10 दिसंबर 2021, इंदौर।

निस्पंद, निश्चल, बे-काम बैठे हुए मन में वो सब कुछ लिख देने की इच्छा उठती है जो हैपनिंग रहा है। वो सब कुछ जिसे सोचकर लगता है कि इसे कहीं दर्ज कर लेना चाहिए, और समेट लेना चाहिए इससे जुड़े तमाम अनुभवों को। बहुत दिनों से मन ही मन प्लान की जा रही, लेकिन एकदम से एक्ज़ीक्यूट हुई मेरी इंदौर यात्रा का आज दूसरा दिन है। कल दोपहर तीन बजे यहाँ पहुंचा और आते ही एक होटल रूम में चेक इन कर लिया। अलग-अलग शहरों में जाकर होटलों में रूम बुक करने, और फिर नहाकर रूम सर्विस से चाय ऑर्डर करने का एक अजीब शौक़ मुझे तब से है, जब से यह शौक़ मुझे पहली बार लगा था। एक तरह का फ़ैसिनेशन है, जो जाता नहीं।

कल कुछ लिख नहीं सका। शाम को जो निकला तो फिर सीधे रात साढ़े बारह बजे रूम में लौटा। भीतर लगे बिस्तर को देखते ही आ रही नींद कुछ और बढ़ गई। सुबह आठ बजे तक सोता रहा। या शायद जागता-सोता रहा – ये कहना उचित होगा। 

छोटे सफ़र तय करते हुए हमेशा लगता है कि क्या अपने सफ़र को, मैं यात्रा कह सकता हूँ? मैंने आज तक जितने भी यात्रा वृत्तांत पढ़े हैं वो सभी इतनी छोटी दूरी के कभी नहीं रहे। “ल्हासा की ओर” और “स्पीति में बारिश” नाम के दो हिन्दी ट्रेवलॉग याद आते हैं। दोनों ही एन.सी.आर.टी. की हिन्दी की किताबों में पढ़े थे। कितने सुंदर वृत्तांत थे वे। स्कूल के दिनों में मुझे वे सिर्फ़ बोझिल सिलेबस लगते थे। आज चाहता हूँ कि वह सिलेबस मुझे और बढ़ी हुई मात्रा में पढ़ने को मिले। शायद, मैं ऐसा इसलिए भी चाह रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि इसकी कोई परीक्षा अब नहीं होनी है। "परीक्षा के डर से ज्ञानार्जन", “डांट या चपत के भय से पढ़ाई-लिखाई” - ये समाज में मौजूद कैसी अजीब क्रियाएं हैं। क्या इन्हें बदला जा सकता है? नई शिक्षा नीति, क्या उससे कुछ होगा?

अपनी छोटी यात्राओं को यात्रा कहने में मुझे हमेशा संकोच हुआ है। अपने आप को ट्रैवलर कहना शायद उन हिचहाईकर्स को अपमानित करना होगा जो ख़ाली जेब लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक के भारत को नाप देते हैं। उनके और मेरे बीच की दूरी को पाट पाना मेरे लिए इस जीवन में संभव नहीं है।

मैं अपने आप को हरगिज़ ट्रैवलर नहीं कह सकता क्योंकि, कहीं के लिए भी निकलते हुए, कहीं पहुंचने के रोमांच से ज़्यादा, लौट आने की आश्वस्तता मेरे मन में घर कर जाती है। और पूरे रास्ते साथ चलती है। दूर उगे पहाड़ों, गिरते झरनों, घने जंगलों, गहरी घाटियों, असीमित समंदरों को देखने की जिज्ञासा से कुछ ज़्यादा इस बात का सुख रहता है कि - वापस नदी के पास आना है, पहाड़ियों पर चढ़ना है, सड़कों पर चलना है, तारे भरे आसमान को एकटक देखते हुए।(सड़क पर चलती गाड़ियों से माज़रत सहित।) नहरों की पाल पर खड़े होकर चाय पीनी है और कप वहीं फेंक देना है(स्वच्छता अभियान से माफ़ी के साथ) ये सब फिर करना है, कभी न कभी। ये कुछ कुछ एक तरह की बीमारी है। जिसकी व्याख्या लेखक निर्मल वर्मा की डायरी में मिलती है।  - होमसिकनेस

विनोद कुमार शुक्ल फिर याद आते हैं, दिनचर्या के किसी काम की तरह। "दीवार में एक खिड़की रहती थी।" किताब का एक किरदार जो कि हाथी चलाता है, एक महावत है। वो कहानी के मुख्य पात्र रघुवर प्रसाद से कहीं के लिए निकलते हुए कहता है - "मैं वहां नहीं लौट रहा हूँ, मैं यहां लौटूंगा।"

कल रात इंदौर के एक पुराने कवि दोस्त प्रबोध पाण्डेय से मुलाक़ात हुई. यह मुलाक़ात उसके नए-नवेले आर्ट कैफ़े में हुई, जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया। कुछ लोग बहुत ज़िद्दी होते हैं। एक ज़िद को अपने से हमेशा लगाए रखते हैं, जैसे कुछ लोग किसी से दिल लगा लेते हैं - हमेशा के लिए। ये लोग किसी और से नहीं, स्वयं से ज़िद करते हैं। और देर सबेर अपने हौसले और दृढ़ता के बल पर उसे पूरा भी करते हैं। प्रबोध ने अपने बचपन के सपने को साकार कर दिया, निराकार को आकार दे दिया। उसने इंदौर में एक लाइब्रेरी-नुमा कैफ़े खोला है। एक तरह का रीडिंग रूम, जहां चाय-नाश्ते की सुविधा भी है। कॉलेजी दिनों में उसके साथ रहते हुए कभी इस सपने का ज़िक्र उसने मेरे सामने नहीं किया। कैसे कुछ लोग मन ही मन अपने "मन की" बुनते रहते हैं। और एक दिन अचानक हम उस बुनाई को देखते हैं। सपनों की बुनाई।

लिखते हुए दोपहर हो गई है। कमरे में नहीं, बाहर। होटल के इस कमरे में घड़ी नहीं है। फ़ोन में 2:00 देख कर मालूम हुआ कि दोपहर हो गई है। यहां इस रूम में कोई दरीचा, खिड़की भी नहीं है। फिर भी कुछ गर्माहट अपने शरीर में महसूस कर पाता हूँ, एक झुरझुरी सी आ जाती है। धूप के विचार से ही धूप का कुछ एहसास होता है। कवि विनोद कुमार शुक्ल के एक कविता-संग्रह का शीर्षक है - “वह आदमी नया गरम कोट पहिन कर चला गया विचार की तरह।“

क़रीब 6  साल पहले के कुछ दृश्य सामने सफ़ेद दीवार पर सिमट आए हैं।  जब इसी कमरे, जहां मैं अभी बैठा हूँ से कुछ किलोमीटर दूर एक ग्रे टीन की छत तले मैं अपने कॉलेजी दिन बिता रहा था।

पांच नम्बर बस - यकायक मेरी आँखों के सामने से दौड़ जाती है। पाँच नम्बर बस - जिससे मैं सुखलिया चौराहे से आईटी पार्क चौराहे तक जाता था। और फिर वहां से वॉक करता था - यूनिवर्सिटी तक। एक अकेली वॉक, विचारों से घिरी हुई, सड़क के शोर से लगी हुई, एक चुप, अंतर्मुखी वॉक - आईटी पार्क चौराहे से देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी तक। जैसे जीवन की लंबी वॉक का एक प्रोटोटाइप।

उंगलियों में एक झिनझिनी महसूस होती है। पैरों के तलुओं में कुछ खिंचाव से लगता है। कलम रख देना चाहता हूँ। पर विचार उमड़ रहे हैं। जैसे धूप के विचार से गर्माहट महसूस हुई थी। वैसे ही "झिनझिनी नहीं है।" का विचार करने से शायद वो चली जाए। खिंचाव मिट जाए। फ़िल्म थ्री इडियट्स का ज़िक्र उमड़ते-घुमड़ते कई विचारों के बीच छिड़ जाता है। एक संवाद स्मरण हो आता है जिसे रैंचो नाम का किरदार बोलता है - "ये दिल बड़ा डरपोक है, इसे समझाकर रखना पड़ता है, आश्वस्त करना पड़ता है, एक तसल्ली देनी पड़ती है कि - "ऑल इज़ वेल।" शब्द शायद जस के तस ना रहे हों, लेकिन अर्थ कुछ कुछ यही था।

 


ऊपर के खाली छूटे स्पेस को, लिखते हुए लिया गया मेरा विराम समझ लीजिये। खाली पड़ी जगह को मेरा कुछ देर थमना मान लीजिए। जैसे गणित में आप क्या कुछ मान लिया करते थे।

"हम जो सोचते हैं वो महसूस कर लेते हैं, या शायद कर सकते हैं।" - ग्रे टीन की छत तले एक बक्से-नुमा कमरे में रहते हुए मैंने इस तर्क का प्रैक्टिकल किया था। अप्रैल की भीषण इंदौरी गर्मी में अपने लोहे के पलंग पर लेटे हुए मैं ठंडी नदी में गौते लगाने के बारे में सोचता, ख़ुद को नर्मदा में तैरते हुए सोचता, सतपुड़ा के पहाड़ों में विचरते हुआ देखता, ऊंचाई पर बहती सुबह की ठंडी हवा में अपने बालों को लहराते हुए देखता। कॉलेज के दिनों में हम कुछ भी करते हैं, है ना? सेन्सलेस टीनएजर्स। भविष्य के होपलेस रोमैंटिक्स।

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Thursday, 18 November 2021

Three Farm Laws Repealed || Celebrations at The Singhu Border



तारीख़ 19 नवंबर 2021 को गुरु नानक देव जयंती के पर्व पर भारत के प्रधानमंत्री ने उन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी जिन्हें आनन-फानन में कोरोना काल के बीच संसद के दोनों सदनों में उन्हीं की सरकार ने पास करवाया था. 17 सितंबर 2020 को लोकसभा और फिर 20 सितंबर 2020 को राज्यसभा में पास होने के बाद यह तीन कृषि कानून 27 सितंबर 2020 को उस वक़्त अस्तित्व में आ गए जब भारत के राष्ट्रपति ने इन्हें मंज़ूरी दे दी. 

और इसके बाद से ही मुख्य रूप से पंजाब, हरयाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसानों ने इन कानूनों का पुरज़ोर विरोध करना शुरू कर दिया. ठंडी, गर्मी, बरसात की परवाह न करते हुए हज़ारों की तादाद में किसान दिल्ली की मुख्तलिफ़ सीमाओं पर मुस्तेदी से डटे रहे और सरकार से इन कानूनों को वापस लेने की मांग करते रहे. इन किसानों को देशद्रोही कहा गया, उपद्रवी घोषित किया गया, खालिस्तानी, उधमी, ना-समझ, मूर्ख, भ्रमित करार दिया गया. उनकी राहों में कील बिछाई गई, दीवारें खड़ी की गई, वाटर कैनन के वार किये गए, लाठियां बरसाई गई, एक क्षेत्र में तो विरोध कर रहे किसानों पर गाड़ी तक चढ़ा दी गई, लेकिन हलधर नहीं रुके, कृषक नहीं थमे, किसानों ने अपना आन्दोलन जारी रखा. और आखिरकार 14 महीने के लम्बे, अहिंसक और धैर्यपूर्ण इंतज़ार/प्रतीक्षा के बाद उस ही सत्ता के सत्ताधीश से अपनी मांगें मनवाई, जिस सत्ता के अहंकार और दंभ के चलते कई किसानों को इस आंदोलन के दौरान अपनी जान की कुर्बानी/आहुति देनी पड़ी.

"है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में // खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़। मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।" - पंक्तियाँ रामधारी सिंह दिनकर के महाकाव्य "रश्मिरथी" की हैं.

घमंड किसी व्यक्ति का हो, किसी समूह का हो, संप्रदाय का हो, या किसी राजनीतिक पार्टी का हो - अधिक समय तक टिकता नहीं है. झूठ ही की तरह, घमंड के भी पाँव नहीं होते. बहुत जल्द लंगड़ाकर गिर पड़ता है. और यह सिर्फ़ आज की बात नहीं है. पूर्व में जब कभी भी संसद से कोई जनविरोधी, अहंकारी, अस्वीकार्य और आक्रमणकारी पैग़ाम आया है, सड़क ने ही उसे वापस संसद भिजवाया है. और आगे भी यह होता रहेगा. क्योंकि ख़ुशकिस्मती से भारत एक प्रजातांत्रिक गणराज्य है. इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल भी संसद से पास हुआ था, लेकिन सड़क ने उसे डंके की चोट पर खारिज किया और अपने अधिकारों की लड़ाई स्वयं लड़ी. आज 19 नवंबर 2021 को इतिहास दोहराया गया है. और मुझे भरोसा है इस राष्ट्र के जागृत लोगों पर, कि आगे भी दोहराया जाता रहेगा. जनता के हक़ों की लड़ाई अनंतकाल तक जारी रहेगी और इस लड़ाई को जनता ही लड़ेगी. कोई विपक्षी पार्टी, दल, दलदल नहीं. लोकतंत्र में जनता को हमेशा "विपक्ष" की भूमिका में रहना चाहिए - ऐसा मेरा मानना है.

विशाल भारद्वाज की फ़िल्म "मक़बूल" में ॐ पूरी साहब और नसीर साहब के बीच का संवाद है - "संसार में शक्ति का संतुलन बहुत ज़रूरी है, आग के लिए पानी का डर बना रहना चाहिए." डेमोक्रेसी भारत में आकर चार नामों से जानी, पहचानी और पढ़ाई जाती है - लोकतंत्र, गणतंत्र, जनतंत्र और प्रजातंत्र. इसमें गौर करने वाली, ध्यान देने वाली, और हिफ्ज़ कर लेने वाली बात बस इतनी है कि चारों ही नामों में - "हम भारत के लोग" पहले हैं, तंत्र बाद में है. "देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता." - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता की पंक्ति है. देश बनता है संविधान से, देश बनता है लोकतंत्र से, देश बनता है कई तरह के विचारों के समावेश से. देश बनता है एकता से, एकरूपता से नहीं. - भारत के हर नागरिक को यह समझना होगा, क्योंकि समस्या की पहचान ही, उसके निराकरण की शुरुआत है.

आज ही ट्विटर पर अपने एक दोस्त निशांत सिंह ठाकुर का एक ट्वीट पढ़ा, जिसमें उन्होंने अम्बेडकर को उद्धृत/कोट करते हुए लिखा है - "We must stand on our own feet and fight as best as we can for our rights. So carry on your agitation and organize your forces. Power and prestige will come to you through struggle. - B. R. Ambedkar."

भारतवर्ष के समस्त किसानों को, कृषि-कानून वापसी की बधाई, और प्रजातंत्र में प्रजा का विश्वास बढ़ाने के लिए सादर धन्यवाद.

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भाजपा का कांग्रेस-काल | Datia & Bankipur By-election Results

चाहे कितनी भी बुलन्दी पे चला जाए कोई, आसमानों से उतारे तो सभी जाएँगे। -शकील आज़मी। बात 1980 की है। जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ...