चाहे कितनी भी बुलन्दी पे चला जाए कोई, आसमानों से उतारे तो सभी जाएँगे।
-शकील आज़मी।
बात 1980 की है। जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने देशभर में बहुमत हासिल कर सत्ता में अभूतपूर्व वापसी की थी। भारतीय राजनीति की आयरन लेडी कही जाने वाली इंदिरा गांधी का विजयी रथ अपने पूरे दम-ख़म के साथ दौड़ रहा था। और इसी तारतम्य में वह जून 1980 को अविभाजित मध्यप्रदेश पहुँचा। यहाँ कांग्रेस ने 320 में से 246 सीटें जीतीं और एक नया इतिहास स्थापित किया।
विपक्ष को हराने के बाद अब बारी अंदरूनी संघर्ष की थी। चुनाव जीत चुकी कांग्रेस से दो धड़े सामने आए। और दोनों के नेताओं ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावा पेश किया।(कांग्रेसी गुटबाज़ी कोई आज की बात नहीं। यह पार्टी के डीएनए में है।) एक गुट था धार जिले से आने वाले शिव भानु सिंह सोलंकी का। और दूसरा था विंध क्षेत्र के नेता अर्जुन सिंह का। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि उस वक़्त अधिकांश विधायकों का साथ शिव भानु सिंह सोलंकी के साथ था। लेकिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व - संजय गांधी और तत्पश्चात इंदिरा गांधी अर्जुन सिंह के पक्ष में थे।
देश में सर्वथा शक्तिशाली कांग्रेस के आलाकमान की बात उस दौर में कोई नहीं टाल सकता था। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने ख़ुद शिव भानु सिंह सोलंकी को फ़ोन किया और आदेश दिया कि वो अपनी दावेदारी वापस ले लें। हुआ भी यही। विधायकों का समर्थन प्राप्त होने के बावजूद शिव भानु पीछे हट गए। और अर्जुन सिंह प्रदेश के बाहरवे मुख्यमंत्री बने।
जैसे-जैसे इंदिरा गांधी और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस मज़बूत होती गई। वैसे-वैसे उनका घमंड बढ़ता गया। सत्ता के मद में उन्होंने ऐसे कई फ़ैसले लिए - जिनका नतीजा वर्तमान में पार्टी भुगत रही है। कभी सर्वशक्तिमान रही कांग्रेस आज सिर्फ़ चार राज्यों में अपनी सरकार चला रही है। और उस दौर के एवज में आज उसके संसद नगण्य हैं।
अब बात 2026 की। तीन अगस्त 2026 की। जब मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट और बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के चौंका देने वाले नतीजे सबके सामने हैं। भारतीय जनता पार्टी दोनों ही सीटों से अपना चुनाव हार गई। दतिया से पार्टी ने वरिष्ठ नेता और टिकिट के सर्वोच्च दावेदार नरोत्तम मिश्रा का टिकिट काटकर आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया। और बांकीपुर से भी एक अनसुने नाम को टिकिट सौंपा। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट हारकर भाजपा ने देशभर में अपनी किरकिरी करवा ली। कारण? वही 1980 वाला इंदिरा गांधी जैसे घमंड। अहंकार। अपने को सर्वेसर्वा समझने वाला चाल-चलन।
भारतीय जनता पार्टी का हालिया इतिहास उठाकर देखें तो हम पाएंगे कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लगातार क्षेत्रीय क्षत्रपों को बगल कर, अनजान नामों को आगे कर देता है। मीडिया इसे भाजपा का मास्टर स्ट्रोक बताती है। आख़िरी पंक्ति के कार्यकर्ता का सम्मान बताती है। लेकिन दरअसल ये शीर्ष आसान पर विराजमान इक्के-दुक्के नेताओं का घमंड है। उनकी आत्ममुग्धता है। उनका ये भरोसा है कि हम जिसके कंधे पर हाथ रख देंगे - वह विजयी हो जाएगा।
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को हटाकर, मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाना। वसुंधरा राजे को हटाकर, पहली बार के विधायक भजनलाल शर्मा को सीएम बनाना, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय को नेतृत्व सौंपना। गुजरात में पहले आनंदीबेन पटेल को, फिर विजय रुपाणी का इस्तीफ़ा लेकर भूपेंद्र पटेल को प्रदेश की कमान सौंपना - ये सभी भाजपा के वो फ़ैसले हैं जो कहीं न कहीं केंद्रीय नेतृत्व के अहंकार, उसकी आत्ममुग्धता और उसकी असुरक्षा को दर्शाते हैं। यही तो वह वजह है जिसके चलते कांग्रेस ने हर राज्य में अपने वफ़ादार तो खड़े किए, लेकिन कभी राज्य स्तर पर, निकाय स्तर पर मज़बूत नेता स्थापित नहीं कर सकी। नतीजन आज वह देश की सत्ता से कोसों दूर नज़र आती है।
वर्तमान नतीजे बताते हैं कि भाजपा का कांग्रेसीकरण अपने चरम पर है। और उसके आलंबरदारों को अपने ही नेता, पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी की ये कविता अपने राष्ट्रीय दफ़्तर पर चस्पा करने की ज़रूरत है - “ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ़ बर्फ़, जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत की तरह ठंडी होती है।”









