Monday, 3 August 2026

भाजपा का कांग्रेस-काल | Datia & Bankipur By-election Results

चाहे कितनी भी बुलन्दी पे चला जाए कोई, आसमानों से उतारे तो सभी जाएँगे।

-शकील आज़मी।

बात 1980 की है। जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने देशभर में बहुमत हासिल कर सत्ता में अभूतपूर्व वापसी की थी। भारतीय राजनीति की आयरन लेडी कही जाने वाली इंदिरा गांधी का विजयी रथ अपने पूरे दम-ख़म के साथ दौड़ रहा था। और इसी तारतम्य में वह जून 1980 को अविभाजित मध्यप्रदेश पहुँचा। यहाँ कांग्रेस ने 320 में से 246 सीटें जीतीं और एक नया इतिहास स्थापित किया।

विपक्ष को हराने के बाद अब बारी अंदरूनी संघर्ष की थी। चुनाव जीत चुकी कांग्रेस से दो धड़े सामने आए। और दोनों के नेताओं ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावा पेश किया।(कांग्रेसी गुटबाज़ी कोई आज की बात नहीं। यह पार्टी के डीएनए में है।) एक गुट था धार जिले से आने वाले शिव भानु सिंह सोलंकी का। और दूसरा था विंध क्षेत्र के नेता अर्जुन सिंह का। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि उस वक़्त अधिकांश विधायकों का साथ शिव भानु सिंह सोलंकी के साथ था। लेकिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व - संजय गांधी और तत्पश्चात इंदिरा गांधी अर्जुन सिंह के पक्ष में थे। 

देश में सर्वथा शक्तिशाली कांग्रेस के आलाकमान की बात उस दौर में कोई नहीं टाल सकता था। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने ख़ुद शिव भानु सिंह सोलंकी को फ़ोन किया और आदेश दिया कि वो अपनी दावेदारी वापस ले लें। हुआ भी यही। विधायकों का समर्थन प्राप्त होने के बावजूद शिव भानु पीछे हट गए। और अर्जुन सिंह प्रदेश के बाहरवे मुख्यमंत्री बने।

जैसे-जैसे इंदिरा गांधी और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस मज़बूत होती गई। वैसे-वैसे उनका घमंड बढ़ता गया। सत्ता के मद में उन्होंने ऐसे कई फ़ैसले लिए - जिनका नतीजा वर्तमान में पार्टी भुगत रही है। कभी सर्वशक्तिमान रही कांग्रेस आज सिर्फ़ चार राज्यों में अपनी सरकार चला रही है। और उस दौर के एवज में आज उसके संसद नगण्य हैं। 

अब बात 2026 की। तीन अगस्त 2026 की। जब मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट और बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के चौंका देने वाले नतीजे सबके सामने हैं। भारतीय जनता पार्टी दोनों ही सीटों से अपना चुनाव हार गई। दतिया से पार्टी ने वरिष्ठ नेता और टिकिट के सर्वोच्च दावेदार नरोत्तम मिश्रा का टिकिट काटकर आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया। और बांकीपुर से भी एक अनसुने नाम को टिकिट सौंपा। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट हारकर भाजपा ने देशभर में अपनी किरकिरी करवा ली। कारण? वही 1980 वाला इंदिरा गांधी जैसे घमंड। अहंकार। अपने को सर्वेसर्वा समझने वाला चाल-चलन।

भारतीय जनता पार्टी का हालिया इतिहास उठाकर देखें तो हम पाएंगे कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लगातार क्षेत्रीय क्षत्रपों को बगल कर, अनजान नामों को आगे कर देता है। मीडिया इसे भाजपा का मास्टर स्ट्रोक बताती है। आख़िरी पंक्ति के कार्यकर्ता का सम्मान बताती है। लेकिन दरअसल ये शीर्ष आसान पर विराजमान इक्के-दुक्के नेताओं का घमंड है। उनकी आत्ममुग्धता है। उनका ये भरोसा है कि हम जिसके कंधे पर हाथ रख देंगे - वह विजयी हो जाएगा। 

मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को हटाकर, मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाना। वसुंधरा राजे को हटाकर, पहली बार के विधायक भजनलाल शर्मा को सीएम बनाना, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय को नेतृत्व सौंपना। गुजरात में पहले आनंदीबेन पटेल को, फिर विजय रुपाणी का इस्तीफ़ा लेकर भूपेंद्र पटेल को प्रदेश की कमान सौंपना - ये सभी भाजपा के वो फ़ैसले हैं जो कहीं न कहीं केंद्रीय नेतृत्व के अहंकार, उसकी आत्ममुग्धता और उसकी असुरक्षा को दर्शाते हैं। यही तो वह वजह है जिसके चलते कांग्रेस ने हर राज्य में अपने वफ़ादार तो खड़े किए, लेकिन कभी राज्य स्तर पर, निकाय स्तर पर मज़बूत नेता स्थापित नहीं कर सकी। नतीजन आज वह देश की सत्ता से कोसों दूर नज़र आती है। 

वर्तमान नतीजे बताते हैं कि भाजपा का कांग्रेसीकरण अपने चरम पर है। और उसके आलंबरदारों को अपने ही नेता, पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी की ये कविता अपने राष्ट्रीय दफ़्तर पर चस्पा करने की ज़रूरत है - “ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ़ बर्फ़, जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत की तरह ठंडी होती है।”


Wednesday, 23 July 2025

चार फूल हैं। और दुनिया है | Documentary Review


मैं

एक कवि को

सोचता हूँ

और बूढ़ा हो जाता हूँ -

कवि के जितना।


फिर

बूढ़ी सोच से

सोचता हूँ

कवि को नहीं। कविता को

और हो जाता हूँ जवान -

कविता जितना।।

-प्रद्युम्न।



वहाँ, जहाँ से विनोद जी कहते हैं - “मैं विनोद कुमार शुक्ल, अपने घर से बोल रहा हूँ।” - हर एक बहस ख़त्म हो जाती है। वहां शर्मसार होती है भ्रष्टता। उसका प्रवेश वहां वर्जित है। 

कुटिलता, चालाकी, तिकड़मबाज़ी - दूर से ही रास्ता बदल लेती हैं। वह एक कवि से बहुत बहुत पहले एक इंसान का घर है। इंसान - जो विरले हैं।

विनोद जी का घर ध्वनियों का घर है। जगहों को वहाँ सुलभ जगह प्राप्त हैं। भाषा का बाल रूप वहाँ खेलता है। शब्द पाँव-पाँव मुस्कुराते चलते हैं। और सब भाव सहजता से रहते हैं। उनमें किसी तरह की आक्रामकता नहीं। मिलावट नहीं। अभिनय नहीं।

विनोद जी के घर में स्थिरता का वास है। जहाँ वे रोज़ कुछ न कुछ रचते हैं। बस! रचा हुआ रोज़ दिखता नहीं। वे सरापा कवि हैं। उनका मौन भी सृजन लगता है। वे ख़ुद ही कहते हैं - “मैं एक शब्द की कविता लिखना चाहता हूँ। अगर एक शब्द से कविता लिखना आ गया, तो मौन से भी कविता लिखना आ जाएगा।” 

विनोद कुमार शुक्ल उस सफ़ेद चॉक की तरह हैं, जिसका ज़िक्र उर्दू अदब के आला अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो ने किया है। - “मैं काली तख़्ती पर सफ़ेद चॉक इस्तेमाल करता हूँ। ताकि काली तख़्ती और नुमाया हो जाए।”

भारत के वर्तमान रचना संसार पर। कथित कवियों, साहित्यकारों, सृजनकर्ताओं पर। समाज पर। - विनोद कुमार शुक्ल सफ़ेद चॉक की तरह हैं। हम सब का कालापन उनके होने से और नुमाया हो जाता है। हम करप्ट हैं। हमें स्वीकार करना चाहिए स्वीकार्यता से सुधार संभव है।

विनोद जी का घर गली के आख़िरी घर जैसा है। और शायद! दुनिया के आख़िरी घर जैसा। घर - जहाँ एक पेड़ है। एक आँगन, एक छत है। दोनों के बीच सीढ़ियाँ हैं। एक झूला, कुछ कुर्सी, कुछ टेबल, किताबें हैं। जहाँ - चार फूल हैं। और दुनिया है।

विनोद जी से जीवन - समृद्ध है। उन्हें मेरा प्रणाम। सदा। हमेशा।

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Monday, 7 July 2025

I am Sorry, Papa | A Note to All Who Failed You


Pain is bigger than God.

-Irrfan Khan



महान ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की एक मशहूर ग़ज़ल का शेर है - गिड़गिड़ाने का यहाँ कोई असर होता नहीं // पेट भरकर गलियां दो आह भरकर बद-दुआ। पिछले पंद्रह महीनों से लगातार मध्यप्रदेश के आधा दर्जन अस्पतालों में जाने और हर एक की व्यवस्था, उनकी दशा और दिशा, उनकी नीति और नीयत को करीब से देखने के बाद ये शेर मेरे माथे पर किसी बयान की तरह चस्पा हो गया है। दुष्यंत कुमार का ही एक और शेर यहाँ गौरतलब हो जाता है - वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है // माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।

ग्यारह जून 2025 को 63 साल की उम्र में मेरे पिता का कैंसर से देहांत हो गया। लगभग एक साल पहले मार्च के महीने में शुरू हुई एक लड़ाई सिर्फ़ पंद्रह महीनों में समाप्त हो गई। लड़ाई जो शुरुआत में तो एक बीमारी के ख़िलाफ़ नज़र आई। लेकिन धीरे-धीरे मालूम चला कि मैं और मेरा परिवार दरअसल इस देश की लचर और चरमराई हुई मेडिकल व्यवस्था से युद्ध लड़ रहा है। व्यवस्था जहाँ मरीज़ से उसकी तक़लीफ़ से पहले उसकी मासिक आय पूछी जाती है। जहाँ रोगी को एडमिट करने से पूर्व ही एक मोटी, भारी-भरकम रकम जमा करवा ली जाती है। जहाँ 10 रूपए की दवाई 1000 रूपए में बेची जाती है। जहाँ डॉक्टर कम, अकाउंटेंट ज़्यादा हैं। जहाँ कदम-कदम पर जांच है। न शर्म है, न लाज है। जहाँ औसत से भी कम कौशल रखने वाले मेडिकल स्टाफ़ हैं। रेलवे स्टेशनों को मात कर देने वाली गंदगी है। मर चुकी संवेदनाएं हैं। ठूठ हो चुकी इंसानियत है। और जहाँ इलाज नहीं, केवल और केवल बीमारियां हैं।

मेरे पिता का इलाज भोपाल के होशंगाबाद रोड स्थित एक अस्पताल में हुआ। अस्पताल - जहाँ सबसे पहले तो एक जनरल सर्जन ने मेरे पिता की कैंसर से जुड़ी सर्जरी की। एक ऐसा कृत्य जो देश-दुनिया की किसी भी मेडिकल गाइडलाइन्स के अनुरूप नहीं था। इस डॉक्टर ने ऑपरेशन के पूर्व या दौरान किसी भी ऑन्कोलॉजिस्ट(कैंसर स्पेशलिस्ट) से बात नहीं की। और फिर ऑपरेशन के बाद प्राप्त हुई पोस्ट-बायोप्सी रिपोर्ट को देखकर हमें घर भेज दिया। इस घटनाक्रम के बहुत बाद में हमें ज्ञात हुआ कि उस पोस्ट-बायोप्सी रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कैंसर फैल चुकने के संकेत थे, लेकिन इसके बावजूद डॉक्टर ने हमें न कीमोथेरेपी की सलाह दी और न रेडिएशन की। 

इंडियन कॉउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च(ICMR) की गाइडलाइन के अनुसार कैंसर की सर्जरी के बाद आसपास के लिम्फ नोड्स को डाइसेक्शन के लिए भेजा जाता है। यह कैंसर की स्टेजिंग और मैनेजमेंट के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इस कदम को बड़ी लापरवाही से डॉक्टर और अस्पताल प्रबंधन ने नज़रअंदाज़ कर दिया। इसका सुबूत है वो पोस्ट-बायोप्सी रिपोर्ट जिसमें साफ़ अक्षरों मैं लिखा हुआ है - "नो लिम्फ नोड्स सब्मिटेड।"

छह महीने बाद पिता को पीठ में कुछ दर्द हुआ तो हम उन्हें लेकर भोपाल के होशंगाबाद रोड स्थित उसी अस्पताल में पहुंचे और उसी डॉक्टर को फिर से दिखाया। कुछ देर अपने हाथों से पिता का शरीर टटोलने के बाद वह घबराते हुए बोला - कैंसर फैल गया है। आप तुरंत फलां अस्पताल चले जाइये। फलां अस्पताल, भोपाल शहर का वह कैंसर अस्पताल है जो अपने इलाज के लिए कम और अपनी रीढ़ तोड़ देने वाली फ़ीस के लिए ज़्यादा मशहूर है। मेरे भोले-भाले पिता छह महीनों तक लगातार इस डॉक्टर को फ़ोन लगाते रहे, पूछते रहे कि क्या उन्हें दिखाने आना चाहिए, क्या उन्हें कोई दवा लेनी चाहिए, क्या उन्हें कुछ ख़ास चीज़ें खानी चाहिए, क्या उन्हें कोई परहेज करना चाहिए। लेकिन इस डॉक्टर ने न उन्हें बुलाया, न उन्हें कोई दवाई बताई, न कोई परहेज बताए, और न ही कोई डाइट-चार्ट दिया। 

छह महीने बाद जब कैंसर फैलने की जानकारी हमें मिली तो हम भोपाल के इंद्रपुरी स्थित एक अस्पताल पहुंचे। यहाँ एक और बार पिता की बायोप्सी हुई और मालूम चला कि जो कैंसर छह महीने पहले लोकलाइज़्ड था, अब वह मेटास्टेटिस हो चुका है, यानी फैल चुका है। साफ़ था कि उस एक डॉक्टर की भूल, भूल या अपराध?, अपराध या पाप? की वजह से मेरे पिता की बीमारी, उनका दर्द, उनकी तकलीफ़ बढ़ गई थी। इसके बाद पिता की एक और सर्जरी हुई। और फिर उसके बाद कीमो और फिर रेडिएशन। बहुत आश्चर्य था कि थेरेपी के दौरान मेरे पिता के शरीर में कोई साइड इफ़ेक्ट देखने को नहीं मिले। और अस्पताल प्रबंधन से हमें इस संशय का कोई संतोषजनक जवाब भी नहीं मिला। 

एक महीने बाद हमें फिर बुलाया गया और किसी भी तरह की जांच नहीं करवाई गई। फिर तीन महीने बाद पिता को अचानक खांसी चलने लगी। इस समस्या को लेकर जब हम अस्पताल पहुंचे तो बताया गया की कैंसर लंग्स में पहुँच गया है। अब ये कौनसा कैंसर है इसकी जांच के लिए भोपाल के अरेरा कॉलोनी स्थित एक अस्पताल में पिता की फिर से बायोप्सी हुई। इस जांच से बाहर आने के बाद पिता ने बताया कि अंदर डॉक्टर के आसपास मौजूद स्टाफ़ को किसी भी मेडिकल इक्विपमेंट की जानकारी नहीं थी। उन्होंने स्टाफ़ को आपस में बातचीत करते सुना था कि - "हम लोगों ने तो कभी बायोप्सी की ही नहीं है।" 

कुछ दिन बाद बायोप्सी की रिपोर्ट आई। इसके बाद पिता का पैट स्कैन हुआ(कैंसर के मामले में सबसे बड़ी और महंगी जांच यही है।) पैट स्कैन की रिपोर्ट में मुझे बताया गया कि कैंसर पिता के पूरे शरीर में फैल गया है। और उनके पास बस तीन महीने हैं। इस बीच पिता बेहद कमज़ोर हो गए। दिन में पांच-दस किलोमीटर आसानी से चल लेने वाले व्यक्ति का खड़े रह पाना दुश्वार हो गया। वे सहारा लेकर भी चलते तो उनका पूरा शरीर काँपता। मैं उन्हें कुछ पल को बैठाता तो वे सर झुकाए बैठे रहते। मानों आसमान के ईश्वर को धरती पर तलाश रहे हों। वे घंटों सीधे लेटे रहते। और जब कभी मैं उन्हें करवट दिलाने की कोशिश करता - उनकी आँखें बड़ी हो जातीं, मुँह खुल जाता। वे दर्द से कराहते नहीं थे। चौंक पड़ते थे। उनका वज़न लगातार गिरने लगा था। चेहरा लटक गया था। उन्होंने पहले खाना छोड़ा, फिर बोलना, और फिर पानी पीना। उनकी धड़कनें बैठती जा रही थीं। और पलकों में बंद आँखें उठती जा रही थीं। अपने अंतिम दिनों में उन्होंने न अपने बेटों से बात की, न अपनी पत्नी से। उन्होंने हमें देखा तक नहीं। डॉक्टरों ने उन्हें कीमोथेरेपी देने से मना कर दिया, और हमें घर चले जाने की सलाह दी। यह सलाह उस अस्पताल से आई जहाँ पिता अपने आख़िरी दिनों में एडमिट रहे। और जहाँ से हमें शायद बस इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि हमने "आई. सी. यू." में पिता को एडमिट करने की इजाज़त अस्पताल प्रबंधन को नहीं दी। असीम दर्द झेलते हुए भी पिता शांत रहते। कभी-कभी रात में अचानक बिस्तर से उठ पड़ते और मेरी आवाज़ सुनकर दोबारा लेट जाते। उनकी आँखों के कोनों से अक्सर पानी बह आता। वे दर्द में थे, और कुछ कह नहीं पा रहे थे। हम उस पानी को पोंछ दिया करते। हम दर्द में थे, और कुछ कह नहीं पा रहे थे। कवि गीत चतुर्वेदी की पंक्ति है - कितनी ऐसी पीड़ाएं हैं, जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं। दैनिक भास्कर के पूर्व पत्रकार/संपादक/स्तंभकार कल्पेश याग्निक ने कहा था कि - सबसे खतरनाक वह चीख होती है, जिसकी आवाज़ नहीं आती। 

अन्न और जल के बाद अब सांस भी उनसे नहीं ली जा रही थी। बहुत कठिन समय था और इस कठिन समय में हम उन्हें भोपाल से होशंगाबाद(गृह निवास) लाना चाहते थे। ऐसे हालात में भी भोपाल के होशंगाबाद रोड स्थित अस्पताल ने हमें एक ऐसी एम्बुलेंस मुहैय्या करवाई जो असल में एक टवेरा गाड़ी थी, जिसके पीछे एक सख्त गद्दे वाली लोहे की बेंच सरि की बेड डली हुई थी। न उसमें ऐ.सी. था, न मेडिकल से जुड़ी कोई भी व्यवस्था, और न ही एम्बुलेंस चलाने में पारंगत कोई ड्राइवर। अपने पूरे शरीर समेत विष्व की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक से लड़ते हुए मेरे पिता ने एक घटिया स्तर की कथित एम्बुलेंस में लगभग डेढ़ घंटे सफ़र किया और आख़िरकार होशंगाबाद स्थित एक निजी अस्पताल में आ पहुंचे। अस्पताल जहाँ का "आई. सी. यू." वार्ड किसी भी सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड से अधिक गया-बीता था। यहाँ आने के कुछ ही घंटों बाद डॉक्टरों ने हमें कुछ दवाइयां लेने के लिए नीचे भेज दिया। जब तक हम ऊपर लौटे इस महान राष्ट्र की महान मेडिकल व्यवस्था ने मेरे पिता को परास्त कर दिया। मेरा और मेरे भाई का सर झुक गया। हम हार चुके थे। और हमारे लिए दुनिया की हर एक जीत अर्थहीन हो चुकी थी। जिस कलंकित एम्बुलेंस से हम पिता को भोपाल से होशंगाबाद लाए थे। उसी से हम उन्हें अस्पताल से अपने घर लेकर गए। सफ़ेद कपड़ों में लिपटे पिता को हमने एम्बुलेंस से बाहर निकाला और उन्हें सीढ़ियों से घर के अंदर ले जाने लगे। एम्बुलेंस पलटी और अस्पताल के लिए लौट गई। भीगी आँखों से मैंने एम्बुलेंस के पीछे वाले गेट पर लिखी जो बात पढ़ी, वह ये थी - "मानवीय सेवा, ईश्वरीय प्रार्थना।"

आज हमारे देश की दुर्दशा ये है कि कोई भी आम नागरिक सुरक्षा के लिए पुलिस, न्याय के लिए वकील और इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाने से घबराता है। सारे रक्षक, भक्षक हो चुके हैं। और हम आज भी हर एक संस्थानात्मक या सरकारी ना-इंसाफ़ी को भगवान की मर्ज़ी मानकर सहते चले जा रहे हैं। हम आवाज़ नहीं उठाते। विरोध नहीं करते। हम कायरता को मुक़द्दर कहते हैं। हम ही लोगों के लिए साहिर लुधियानवी ने लिखा है - इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे। उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे आँसू पी लेंगे। और दुष्यंत कुमार ने हम पर लानत देते हुए कहा है - इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात // अब किसी भी बात पर खुलती नहीं है खिड़कियां।

पिता चले गए हैं। और उनके साथ चला गया है ये यकीन - कि अच्छाई से सब कुछ सुधरता है। कि ईमानदारी से बड़ा कोई सुख नहीं। लेकिन उम्मीद नहीं जाती। वह रहती है। डूबते को तिनके के सहारे जैसी। ऊंठ के मुंह में जीरे जैसी। रात कमरे में ज़ीरो बल्ब के जैसी। खाली पर्स में बरकत के सिक्के जैसी। कविता जैसी। कला जैसी। उम्मीद। उम्मीद जो कहती है कि इन्साफ़ होगा। अपराधी नापे जाएंगे। पापियों को दंड मिलेगा। समय सबका हिसाब करेगा। दुष्ट शिशुपाल को पता भी नहीं चलेगा कि कब उसके सौ अपराध पूरे हो गए। और जब वह पूरे होंगे श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलेगा। अवश्य चलेगा। और सबकुछ बराबर कर देगा।

प्रचलित अमेरिकी सीरीज़ चेर्नोबिल का कथन है - When the truth offends, we lie and lie until we can no longer remember it is even there, but it is, still there. Every lie we tell incurs a debt to the truth. Sooner or later, that debt is paid.

I wish I could do more. I am Sorry, Papa.

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Friday, 16 May 2025

For Peace to Prevail, The Terror Must Die || American Manhunt: Osama Bin Laden



Freedom itself was attacked this morning by a faceless coward, and freedom will be defended.


-George W. Bush



Gulzar Sahab, in one of his interviews, was asked this once: “Do you think we have made enough films or written enough literature about the horrors of the India-Pakistan Partition?” He, being a victim of it himself, said, “No. We haven’t. And there won’t be enough ever.”


Films made, books written, art created around any horrifying historical incident never feel enough. Because one can never get over something that in one way or the other, changed the course of humanity, the course of history, and sometimes even the course of geography.


How many films? and I say honest, genuine, deeply felt films have we made on the 1993 serial bombings in Mumbai? How many films on the 2006 local train blasts? & How many on the heinous terror attack of 26/11? Less than a dozen I guess!


There are so many attacks, massacres, killings, genocides that we as a nation have faced, have suffered. But do we talk about them enough? No, we don’t. We feel as if just talking about terror is a threat to peace and humanity. You know what? It’s not. For Peace to Prevail, The Terror Must Die. And for the terror to die, it must be talked about fearlessly.


Think about the amount of literature and cinema that’s been made on and around Nazi cruelty. Think about what Americans have made continuously on the attacks of 9/11 and about Operation Neptune Spear. They talk about it almost every single year through their films, their writings, their shows - because they don’t want to forget what is considered to be the greatest tragedy they went through in modern history.


Netflix's Documentary American Manhunt: The Killing of Osama Bin Laden is the latest & exact example of the fact, I am talking about. A perfectly made documentary with detailed explanations on how American agencies, after a long wait of 15 years, found and killed Al-Qaeda’s supremo, wanted terrorist Osama Bin Laden.


There is a scene from a Shahrukh Khan starrer film Ra-One, where the character played by actor Arjun Rampal says this dialogue, and I quote: “Tum log Raavan ko har saal kyun jalate ho? Kyonki tumhein yakeen nahin hota ki vo mar chuka hai.”


It’s hard to gulp it down. But it is a fact that - “Till the time there is humanity, there will be terrorism.” But so will be the counters. The defense. The fightbacks. The attacks, the violence, the wounds, the scars, the pain they inflicted must not be forgotten, because if you do so you will start taking peace for granted. I recall a famous African proverb that says - "The axe forgets, but the tree remembers."


Peace, just like freedom, isn’t a one-time goal. It’s not eternal. It has to be achieved again and again and again. Its pursuit is perpetual. “Let everything happen to you. Beauty or terror. Just keep going. No feeling is final,” said the poet Rainer Maria Rilke. And I agree with him.


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Monday, 12 May 2025

My Mother’s Love Language



A few months ago, I was in a meeting with comic and poet Rajat Sood. I wanted to bring him in for an event, and we were brainstorming what kind of immersive experience we could create. That’s when he suggested his very own podcast show, Love Language. It was built around a Q&A model with guests and audience members, and it revolved around themes of love, relationships, breakups, and so on.

The event ended, but the title stayed with me—Love Language.

On another occasion, I was with one of my colleagues. While chatting over a cup of chai, she asked me, “What is your love language?”

I went blank. I had no answer to the question. (And I must tell you, I don’t like not knowing.)

“I don’t quite understand the term. Can you give a few examples?” I replied.

“When you love someone, you don’t just say it—you show it. Love is mostly about actions. And the ways in which you show your love to someone define your love language. It’s as simple as giving flowers to your loved ones, cooking for them, making a cup of tea, taking them to their favorite film or a place they love, or just being there for them all the time,” she explained.

I don’t know why—even after such a descriptive explanation—I still couldn’t grasp it. I didn’t understand what a love language truly was. What I did recall was this quote from The Dark Knight: “It’s not who I am underneath, but what I do that defines me.”

Until recently—when I got a WhatsApp message from my mother: “Mere phone mein balance daal dena.” 

Now, there’s a common practice in many middle-class families in second- or third-tier Indian cities: the eldest son is responsible for recharging the parents’ phones. My father calls me every month to remind me of this. But my mother never calls. She always texts. And it’s not just about a phone recharge. If it’s someone’s birthday in the family, she texts me and asks me to wish them. If there’s a festival, she messages and tells me to visit a temple.

I’ve never told her this, but she somehow knows I’m not a “call” person. I like texting. And maybe that’s a love language too—the best one of all. I now know what a love language is. But even today, I have no idea what mine is.


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Wednesday, 7 May 2025

हम भारत के लोग | Pahalgam Terrorist Attack & Operation Sindoor



विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।


-तुलसीदास


पहलगाम, कश्मीर में हुए कायराना आतंकी हमले के दो दिन बाद की बात है। मैं सुबह-सुबह दैनिक भास्कर अख़बार की एक ख़बर पढ़ रहा था। हमले में हमारे 26 नागरिक मारे गए थे - और यह रिपोर्ट उन सभी का ज़िक्र करते हुए लिखी गई थी। इसके एकदम आख़िर में हर एक शख़्स की तस्वीर थी, जिसके नीचे उनका और उनके राज्य का नाम था। फ़ेहरिस्त में - महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, हरयाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, पंजाब, केरल, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, आंध्र, अरुणाचल - सभी का नाम था। एक ही दिन, एक ही वक़्त पर, एक ही जगह - पूरा देश मौजूद था।


आज ठीक इस समय भी आप देश के चाहे किसी कोने में चले जाएं, आप पाएंगे कि कश्मीर की ही तरह वहां भी किसी न किसी नज़रिये से पूरा देश मौजूद है। भारत मौजूद है। अनेकता में एकता के नारे को अनवरत चरितार्थ करता ये अद्भुत देश - जिसका संविधान, जिसकी सेना, जिसके लोग, जिसकी संसद, जिसकी तमाम व्यवस्थाएं कुछ इस तरह एक दूसरे में गुथी हुई हैं, कि इनमें से किसी का भी बिखरना संभव नहीं है। यहाँ एक व्यवस्था के ऊपर दूसरी व्यवस्था है और दूसरी के ऊपर तीसरी। भारत वह वृक्ष है जिसके तने और जिसकी जड़ें - दोनों समान गति से बढ़ती हैं। हमें न उखाड़ पाना मुमकिन है, और न काट पाना। न आदि, न अंत।


विगत कुछ वर्षों में जो कुछ अफ़ग़ानिस्तान में हुआ, जो श्रीलंका में, और बांग्लादेश में हुआ - वैसा कुछ भी हमारे यहाँ नहीं हुआ। क्योंकि हमारी मान्यताएं, हमारी संस्कृति - सर्वधर्म सम्भाव की है। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति की है। वसुधेव कुटुंबकम की है। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरियसी की है। हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारी एकता(एकरूपता नहीं।), एकजुटता ही दहशतगर्दों के आँखों की किरकिरी है।


अखंडता प्रमाण है -- नींव संविधान है। संविधान जो भारत के अजेय रथ का सारथि है। संविधान जो बहुधा समस्याओं के बावजूद भी सुखद भविष्य की उम्मीद को मरने नहीं देता। संविधान जो हर नागरिक को शक्ति देता है, लेकिन किसी को भी सर्वशक्तिमान नहीं बनने देता। संविधान जो ख़ुद अपने में सुधार की सम्भावना को जीवित रखता है। संविधान जिसे जाति, धर्म, पंथ, समुदाय, राज्य, भाषा आदि सब कुछ दिखाई देता है। और इसलिए वह न्याय के ऊपर इनमें से किसी को नहीं रखता।


और संविधान जो कर्नल सोफ़िया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह की हिम्मत बनता है और उन्हें अपने देश की रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपता है। आज मुझको, आपको, हम सबको अपने प्यारे भारत पर, अपनी भारतीयता पर गर्व है। और ये गर्व सदैव अक्षुण्ण रहना चाहिए।


शेर महशर अफ़रीदी का है - ज़मीं पे घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं // हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं।

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Devil Will Follow You Home | Sinners | Movie Review




Years back I was in this screenwriting workshop with Satyanshu Singh(Writer, Director of critically acclaimed film Chintu ka Birthday) & while discussing various film writing structures he said: “It doesn’t matter what the end is. What matters is how you arrive at it."

Nicest example he gave was of the film “Dilwale Dulhaniya Le Jayenge” One knows right from the title that - “Dilwale Dulhaniya le jayenge”. But “Kaise le jayenge?” Nobody knows. Another example he gave was of Lagaan, where the audiences in their heart knew that Bhuvan & his team is gonna win the match. But they didn’t know - “How?”


The other day at a writing workshop by Rabia Kapoor, she enunciated the same thought. “Writing is all about the process and not the end result.”


There is no limit to how many Vampire, Zombie, Devil movies we have witnessed over the years. From “Walking Dead” to “Last of us” & “Train to Busan” to “All of us are dead” or “Cargo” & from “Vampire Diaries” to “Twilight” (When I am writing this I can’t stop thinking of the films “Hotel Transylvania” & “Zombieland“) — So many of them but each with a different narrative. With a signature of their own. Similar when seen from a wider angle but so different when seen in close up.


A visual treat set in Delta, Mississippi — “Sinners” wasn’t just a vampire movie to me. It was my introduction to a genre of music called “Blues”(something I knew nothing about) It was a window into the lives of African-Americans & hardships they faced. & into the Juke Joints they built as their hangout spaces. It was a lesson in being able to tell a story, even when you think it’s been told several times before. It in some weird unexplainable manner felt like a puzzle solved to me. A sigh of relief.


Because no matter how many times a tale is told. There will always be an unsaid perspective. Perspective that depends upon your answer to — “How?”


Keep Visiting!

Friday, 22 September 2023

पूरे चाँद की Admirer || हिन्दी कहानी।



हम दोनों पहली बार मिल रहे थे। इससे पहले तक व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर बातचीत होती रही थी। हमारे बीच हुआ हर ऑनलाइन संवाद किसी न किसी मक़सद से था। किसी न किसी काम से जुड़ा हुआ था। यह पहली बार था जब हम ऑफ़लाइन मिल रहे थे और वो भी बिना किसी मक़सद के। या शायद! मेरे पास उस रोज़ उससे मिलने का एक मक़सद तो था - उससे बार बार मिलने का मक़सद।

मैं मुंबई में बतौर इवेंट और आर्टिस्ट मैनेजर काम कर रहा था। और वो आर्टिस्ट थी। मैं उससे ज़िंदगी भर के लिये मैनेज होने का ख़ाब लिए उससे मिल रहा था।

वो मुझसे क्यों मिल रही थी? मैं नहीं जानता था। शायद! वैसे, जैसे कोई भी आर्टिस्ट किसी भी आर्टिस्ट मैनेजर से मिलता है। या शायद! वैसे, जैसे कोई भी किसी से ऑनलाइन मिलने के बाद एक बार उससे ऑफलाइन मिल लेना चाहता है।

हम दोनों शहर के एक नामी कैफ़े में कॉफ़ी पीने के बाद टहल रहे थे। कैफ़े के पीछे सड़कों का एक जाल सा था। उसी जाल में फँसी एक भटकी हुई सड़क पर हम दोनों साथ थे। पास नहीं। सिर्फ़ साथ।

“ग्लैड दैट वी मेट।” हमारे कदम साथ साथ आगे बढ़ रहे थे।

“वी वुड हैव मेट पहले ही। मगर आपका बीज़ी शेड्यूल दोस्त। मैं क्या ही कर सकता था।” मैं सड़क के दोनों तरफ़ लगे पेड़ों को निहारते हुए चल रहा था। मैं उसे निहारते हुए चलना चाहता था।

“अरे यार काफ़ी काम है आजकल। और फिर ऊपर से मेरे हेल्थ इशूज़।” वो अपनी काली ड्रेस को कुछ ठीक करते हुए आगे बढ़ रही थी। उसके काले लिबास से अधिक सफ़ेद उस वक़्त और कुछ नहीं था।

शाम ढल रही थी। सड़क कई कैफ़े और रेस्टोरेंट से घिरी हुई थी। सितंबर के आख़िरी दिन थे। बारिश नहीं थी मगर बारिश की गंध मौसम में बची हुई थी। आसपास एसी महक छाई थी जैसी पुराने घरों की दीवारें से उठती है। उनके सील जाने पर।

हरहराते पेड़ों के नीचे लैंप पोस्ट जल उठे थे। और एक के बाद एक सभी कैफ़े और रेस्टोरेंट लोगों की आमद से खिल रहे थे।

प्लेटों, चम्मचों, और गिलासों के टकराने की आवाज़ें आने लगी थीं। लोगों को हंसते हुए सुना जा सकता था।

“कैसे हेल्थ इशूज़?” मैंने कुछ हिचकिचाते हुए पूछा।

“कहानी है। लंबी है लेकिन।” उसने मुझे देखा।

“सुनाने वाली आप हो तो फिर लंबी से लंबी कहानी सुनी जा सकती है।” मैंने कहा। उसके साथ फ़्लर्ट करने का मेरा ये पहला अटेम्प्ट था।

वो मुस्कुराने लगी। मैं मन ही मन शर्माने लगा। फिर मुझे देखते हुए वो यकदम मेरे बग़ल से होते हुए सड़क किनारे एक कार के पास जाकर खड़ी हो गई। कार के ऊपर एक चितकबरी बिल्ली बैठी हुई थी। वो उसका सर सहलाने लगी। और फिर मैंने देखा कि वो उससे बात करने लगी है। वो लगभग पाँच मिनिट वहाँ रही। उसने अपने फ़ोन से उस बिल्ली की एक फ़ोटो ली और फिर वापस मेरे साथ आ गई। मेरे पास नहीं।

“टू क्यूट।” उसने अपना फ़ोन देखते हुए कहा।

“टू क्यूट।” मैंने उसे देखते हुआ सोचा।

वो अपने फ़ोन ही को देखते हुए आगे बढ़ रही थी। मैं ऊपर आकाश में किसी बातचीत का कोई सिरा तलाशते हुए चल रहा था।

शाम का बैंगनी आसमान धीरे-धीरे सियाह होने लगा था। पेड़ों के रास्ते हवा का आना-जाना चल रहा था।

बादलों के जो इक्के-दुक्के फ़ाये कुछ देर पहले तक आकाश में थे, अब वो अंधेरे में लोप हो गए थे। चाँद जो पहले से आसमान के शिखर पर था, रात के वहाँ फैल जाने से नुमाया होने लगा था। जैसे ब्लैकबोर्ड पर चॉक से बनी कोई आकृति हो।

क़तार में खड़ी लैंप पोस्ट्स का उजाला सड़क पर हावी था। अगर मेरा ध्यान आसमान पर न होता तो मुझे मालूम नहीं चलता कि वहाँ चाँद ने दस्तक दे दी है।

लगभग दो मिनिट तक चाँद का आने देखने के बाद जब मैंने वापस आँखें उसकी ओर कीं तो देखा कि अब उसकी आँखें आसमान में खोई हुई हैं। जब मैं आकाश में डूबा हुआ था, क्या तब उसकी आँखें मुझ पर लगी थीं? मैंने सोचा। और सोचते ही एक झुरझुरी मेरे शरीर में दौड़ गई।

“फ़ुल मून नाईट।” उसके होंठ बुदबुदा रहे थे। वो रात पूरे चाँद की थी।

“हैप्पी फ़ुल मून टू यू।” वो अपने फ़ोन से बिल्ली की तरह चाँद की भी तस्वीर निकालने लगी। पूरे चाँद को देखकर उसका चेहरा चाँद ही सा दमकने लगा। वो पूरे चाँद की पक्की वाली एडमायरर थी।

मुझे मालूम हो गया कि उसकी दिलचस्पी पूरे आसमान में नहीं। सिर्फ़ उसपर टंगे पूरे चाँद में थी। ठीक वैसे जैसे मेरी उसमें थी।

“जैसे जैसे रात की डेप्थ बढ़ती है। वैसे वैसे चाँद का शेप बढ़ता है। इट इस ऑनली दी डीपेस्ट नाईट, व्हेन वी कैन विटनेस दी ब्राइटेस्ट मून। फ़ुल मून। ब्यूटीफुल नो?” उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा।

फ़िल्म होती तो यही वो दृश्य होता जिसमें हीरो-हिरोइन एक दूसरे को किस करते। लेकिन फ़िल्म नहीं थी। यथार्थ था। यथार्थ में शायद हम दोनों हीरो-हिरोइन तो थे। लेकिन अपनी-अपनी कहानी के। हमारी कहानी एक नहीं थी।

मैंने हाँ में अपना सर हिलाया और उसके फ़ोन में चाँद की तस्वीरें देखने के लिये उसके कुछ और क़रीब चला गया।

हम फ़ोन में देखते हुए आगे चलने लगे। आसपास से लोगों का गुज़रना चलता रहा। सड़क के दोनों तरफ़ रात जगमगाने लगी।

“सो यू आर ए केट पर्सन?” मैंने उससे पूछा। मुझे लगा जैसे मैं इस तरह का सवाल किसी से भी पहली बार पूछ रहा हूँ। जिस परिवेश से मैं आता हूँ वहाँ ऐसे सवाल कोई किसी से नहीं करता।

“आय एम नॉट एक्चुअली।” उसने कुछ हैरानी से कहा। उसके बग़ल से घंटी बजाते हुए एक साइकिल वाला तेज़ी से निकल गया।

“तो फिर?” मैंने अपने दोनों हाथ अपनी जींस के जेबों में डाल रखे थे।

“मुझे डॉग्स ज़्यादा पसंद हैं। घर पर तीन हैं। और वो सब स्ट्रे डॉग्स हैं। हमने उन्हें पाल रखा है। पर हाँ बिल्लियाँ भी पसंद हैं मुझे।” उसके चेहरे पर लगातार चलते रहने से पसीना उभरने लगा था।

फ़िल्म होती तो मैं उसे अपना रूमाल दे रहा होता। मगर ये यथार्थ था। यथार्थ में न मेरे पास रूमाल था और न मैं वो हीरो था जिसके पास हालात के हिसाब से हर चीज़ रहती है।

“इंट्रेस्टिंग।” कहते हुए मैंने अपने सर को वर्टिकली हिलाया। कहने के अगले ही क्षण मैं जान गया कि वहाँ उस जगह उस शब्द का कोई मतलब नहीं था। लेकिन कुछ तो बोलना ही था। सो अंग्रेज़ी का एक आमफ़हम शब्द मैंने बोल दिया। 

मैं जब भी किसी लड़की से बात करता हूँ, अंग्रेज़ी में बोलने लगता हूँ। - ये एक अजीब तरह का फ़ेनोमना है। जिसे मैं आए दिन जीता हूँ।

बारिश की गंध के बीच चलते हुए हमें मालूम ही नहीं चला कि कब हम बारिश के बीच चलने लगे। तेज़ हवा के साथ पानी का एक शॉवर सा गिरने लगा। भुट्टे और मूँगफली बेच रहे कुछ ठेले वाले जो वहीं किनारे पर एक के बाद एक खड़े थे। अपने ठेलों के चारों तरफ़ लगे डंडों पर मोमपप्पड़(प्लास्टिक शीट्स।) चढ़ाने लगे।

कारों पर बैठी बिल्लियाँ आसमान में देखने लगीं। मैंने उनकी आँखों में बारिश को गिरते देखे।

हम दोनों सड़क के कोने-कोने पेड़ों के नीचे चलने लगे। और तभी अचानक एकसाथ सभी लैंप पोस्ट्स बंद हो गयीं। हवा का वेग बढ़ गया। बारिश पहले की ही तरह मद्धम बरसती रही। लैंप पोस्ट्स बंद होते ही, आसमान के सिंहासन पर बैठा चाँद धरती पर आ गया। रात रूपहली हो गई। लगा जैसे सड़क पर चाँदी चढ़ा दी गई हो। पेड़ों पर गिर रहा बारिश का पानी चमकते हुए कारों पर गिरने लगा। हर दूसरी-तीसरी कार पर कोई भूरी, नारंगी, चितकबरी, या सफ़ेद बिल्ली दिखाई दे जाती थी।

बिल्लियों की इस लाइन में हमने देखा कि सबसे आख़िर में एक काली कार पर एक काली बिल्ली बैठी हुई है। हमें लगा जैसे दो हरी आँखें हवा मैं तैर रही हों। और जो तैरते हुए चाँद तक जाना चाहती हों।

वो इस दृश्य को छोड़ नहीं सकती थी। वो दबे पाँव किसी बिल्ली की ही तरह उस काली बिल्ली के पास पहुँची और बारिश की परवाह किए बिना अपने फ़ोन से बिल्ली और उसके ऊपर टंगे गेंद से चाँद की तस्वीरें लेने लगी। पेड़ों से रिस रहा पानी उसके उघड़े कंधों पर गिरता और फिर बाहों के सहारे उसकी मुड़ी हुई कोहनियों तक पहुँचकर नीचे गिर जाता।

मैं उसकी कोहनियों से हो रही बारिश को एकटक देख रहा था। और वो पूरे चाँद की मोहब्बत में मुब्तला थी। वो कुछ आगे निकल गई थी। मैं पीछे से ही उसे निहार रहा था।

“इधर आओ जल्दी।” उसने अपना फ़ोन अपने बैगनुमा पर्स में रख लिया और हाथ के इशारे से मुझे वहाँ बुलाने लगी जहां वो थी - काली बिल्ली के पास।

मैंने कुछ ही कदम बढ़ाये थे कि वो हरी आँखें वहाँ से ग़ायब हो गईं। “उन्हें चाँद मिले।” मैंने सोचा। और उसके बाजू में जाकर खड़ा हो गया।

“मेक ए विश।” उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। और ख़ुद अपने दोनों हाथों को आपस में भींच कर चाँद की तरफ़ देखने लगी।

मैंने पहली बार किसी को टूटते तारों से नहीं। पूरे चाँद के आगे दुआ माँगते देखा था। मैं इस ख़याल की ख़ूबसूरती में इतना मसरूफ़ हो गया कि पूरे चाँद से कुछ नहीं माँग सका। उसने माँग लिया। मैं नहीं जानता क्या।

उसे पूरे चाँद के आगे प्रार्थना में खड़ा देख। मुझे कवि राजेश जोशी की एक कविता याद हो आई। जिसका शीर्षक है - कवि, चाँद और बिल्लियाँ।

मेरे पीछे कारों पर बिल्लियाँ थीं। मेरे ऊपर था पूरा चाँद। और मेरे सामने था उसका(कवि का) दमकता चेहरा। - दुआ में झुका हुआ।

“शुड वी वॉक मोर?” उसने चाँद से अपनी नज़रें हटा लीं। उसकी प्रार्थना पूरी हो गई थी।

“कुछ खा लें? फिर वॉक करते हैं। बारिश में।” मैंने अपने गीले बालों से उँगलियाँ गुज़ारते हुए कहा।

मैंने ये कहा और हठात् मेरे सामने से वुडी एलन की फ़िल्म “मिडनाइट इन पेरिस।” के कुछ दृश्य दौड़ गए।

लैंप पोस्ट्स बंद थे। लेकिन कैफ़े और रेस्टॉरेंट्स से आते उजाले ने फ़ुटपाथ्स को रौशन कर रखा था। हम जो अब तक सड़क की बायीं तरफ़ चल रहे थे, उसके दायीं और आ गए। और फ़ुटपाथ से होते हुए कोई रेस्टोरेंट तलाशने लगे।

भुरभुरी बारिश अब भी हो रही थी। बहुत कम लोगों के हाथों में छाते नज़र आ रहे थे। एक छाता गुठनो के बल हमारी ओर चला आ रहा था। जिसे देख हम मुस्कुराए थे। उसने उसकी भी तस्वीर ले ली थी। - एक छोटा सा बच्चा जो अपने माता-पिता के साथ छाता लिए बारिश से बचता हुआ आगे बढ़ रहा था।

चलते हुए वो एक कैफ़े एंड रेस्टोरेंट के सामने रुक गई।

“यहाँ चलते हैं।” उसने मुझे देखा।

मैंने कुछ नहीं कहा। हम दोनों कैफ़े की ओर मुड़ गए। वो सड़क से अंदर दबा हुआ एक नन्हा कैफ़े था। अंदर दाखिल होते ही पहले एक छोटा सा पोर्च एरिया था और फिर तीन सीढ़ियाँ ऊपर कैफ़े का मैन ईटिंग एरिया। वहीं अंदर ऑर्डर एरिया और रिसेप्शन भी था। पोर्च में बहुत से अनाम पौधे सजे हुए थे। और छत से इलेक्ट्रिक लैंप लटक रहे थे।

बाहर से सीढ़ियों तक के रास्ते पर मिट्टी जैसे रंग की टाइल्स लगी हुई थीं। और सीढ़ियों के ठीक आगे मोटे काँच का एक दरवाज़ा था, जो हरे रंग से रंगी लकड़ियों में फ़्रेम्ड था।

भीतर चोकोर आकार में चार टेबल और उनके इर्द-गिर्द २-२ कुर्सियाँ रखी हुई थीं। 

मैंने उसके लिए दरवाज़ा खोला और वो झुक कर अंदर चली गई। मैं उसके पीछे गया। हम दोनों के पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

हमने एक टेबल लिया और सामने-सामने बैठ गए। 

बाहर लैंप पोस्ट्स फिर जल उठे। बारिश बंद हो गई। भुट्टे और मूँगफली बेच रहे लोगों के ठेलों से उठ रहा धुआँ चाँद तक रास्ता बनाने लगा। अंदर वो अपने चेहरे और बाहों पर जमे पानी को टिशू पेपर से पोंछने लगी। मैं उसे कॉपी करने लगा। और तब मुझे देखकर वो हँस पड़ी।

“व्हाट आर यू डूइंग?” उसने हंसते हुए कहा।

“ड्राइंग माइसेल्फ़। जस्ट लाइक यू।” मैं मुस्कुराया।

“व्हाई लाइक मी?” वेटर ने हमारे बीच पानी के दो गिलास और मिनरल वॉटर की एक बोतल रख दी। ठीक इसके बाद उसने वहाँ का मेन्यू भी टेबल पर एक सिमेट्री में रख दिया।

“व्हाई नॉट लाइक यू?” मैंने बोतल खोली और अपने पास रखे गिलास को भरकर पानी के दो-तीन घूँट लिए। पानी पीते हुए मुझे लगा कि क़ायदे से मुझे पहले उसे पानी ऑफ़र करना चाहिए था। ख़ुद कुर्सी पर बैठ जाने से पहले उसके लिए कुर्सी पीछे करनी चाहिए थी। उससे पूछना चाहिए था कि कहीं भीगते रहने की वजह से उसे ठंड तो नहीं लग रही। मुझे एक झटके में अपनी सभी ग़लतियों का एहसास हो गया।

हालाँकि हम दोनों की मुलाक़ात कोई डेट नहीं थी। मिलने की योजना बनाते हुए हम में से किसी ने भी “डेट” लफ़्ज़ का इस्तेमाल नहीं किया था। लेकिन सिर्फ़ डेट पर ही एक जेंटलमैन की तरह बर्ताव किया जाए - ऐसा कहाँ लिखा है?

मैं उस क्षण मन ही मन पछताने लगा। और मुझे मालूम हो गया कि लड़कियों के साथ पेश आने के मामले में उत्तर भारतीय लड़कों के बेसिक्स ही हिले हुए हैं।

“प्लेइंग विथ वर्ड्स एंड ऑल। ऑफ़कोर्स यू आर ए पोएट। नाउ आई कैन सी इट वैरी क्लियरली।” उसने भी अपना गिलास भरा और पानी पीने लगी।

“देन! व्हाट विल यू हेव सर?” उसने मेन्यू अपने हाथ में ले लिया।

“दोस्त मुझे तो ये फैंसी मेन्यू समझ ही नहीं आते। तुम जो चाहो मँगवा लो।”

मेन्यू का कवर देख कर ही मैं समझ गया था कि उसके अंदर इस्तेमाल की गई भाषा मेरे पल्ले नहीं पड़ेगी। मैं ऐसे मेन्यू पहले देख चुका था जिनमें लिखी चीज़ों को पढ़कर ये बताया नहीं जा सकता था कि उनमें खाने की आख़िर कौनसी चीज़ आएगी।

“फ़ूड शुड लुक गुड। टेस्ट इस सेकेंडरी।” - इस देश के लगभग सभी आलीशान रेस्टोरेंट इसी कथन पर चल रहे हैं।

“आई विल हैव रिज़ोटो। यू हैव लज़ानिया?” उसकी आँखें मेन्यू पर गढ़ी हुई थीं।

“श्योर।” मैंने लज़ानिया का नाम तो सुन रखा था। लेकिन उस रात पहली बार उसे खाया।

“ओके! लेट्स ऑर्डर अवर इटैलियन डिनर।” उसने वेटर को हमारा ऑर्डर लिखवाया और फिर अपनी कुर्सी पर थोड़ा आगे सरक आई। अपने दोनों हाथ उसने एक के ऊपर एक टेबल पर रख दिये। और मुझे देखते हुए अपनी दोनों बोहें उचकाईं।

“कुछ कहो।” उसने इशारे से कहा।

“तो तुम्हें कुत्ते पसंद हैं?” मैंने पूछा। कुछ निश्चित जगहों पर कुछ शब्दों का उपयोग उनके अंग्रेज़ी अनुवाद में ही किया जाये तो बेहतर। पूछ लेने के बाद मुझे लगा।

“हाँ। हैदराबाद में तीन हैं हमारे पास। बताया था मैंने शायद?” उसकी आवाज़ पूरे कैफ़े में गूंज गई। वहाँ उस वक़्त हम दोनों के अलावा सिर्फ़ वहाँ का स्टाफ़ था।

“यस यू टोल्ड मी अभी बाहर ही। वैसे मेरे पापा की एक थ्योरी है कुत्तों को लेकर। बुरा न मानों तो बताऊँ। बेसिकली इट्स ऐन अनपॉपुलर ओपिनियन।” मैंने थोड़ा झेंपते हुए कहा।

उसने एक गहरी साँस ली। मैंने कैफ़े की सफ़ेद दीवार के आगे उसकी काली ड्रेस को साँस लेते हुए देखा।

“गो ऑन। बताओ क्या है तुम्हारा अनपॉपुलर ओपिनियन।” उसने हल्की हंसी के साथ कहा। वो मेरे डर को समझ रही थी। उसकी हंसी में मेरे लिए सहानुभूति थी।

“देखो दुनिया का हर पालतू जानवर अपने मालिक के प्रति वफ़ादार रहता है। मेरे और मेरे पिताजी के ख़याल से कुत्ते वफ़ादार से ज़्यादा चापलूस होते हैं। हमेशा मलिक के आगे-पीछे दुम हिलाये, जीभ निकाले घूमते रहते हैं। मालिक चाहे जो करे - चापलूस कुत्तों की नज़र में सब सही ही होता है। और इसलिए वो हमेशा उसकी जय-जयकार में भौंकते नज़र आते हैं। बदले में वो मालिक का प्यार, दुलार,लाड़, संरक्षण पाते हैं। और साथ ही उन्हें मिलता है अपनी चापलूसी का इनाम जैसे दूध-बिस्किट, ब्रेड, मछली, मीट इत्यादि इत्यादि। जितनी आला चापलूसी उतना आला इनाम।

कोई हैरानी नहीं कि इस देश के लगभग हर नेता, अभिनेता, उद्योगपति के पास चापलूस कुत्ते हैं। किसी के पास एक, किसी के पास दो, किसी के पास दो सौ, किसी के पास दो हज़ार और कहीं कहीं तो इससे भी ज़्यादा।

समाज के हर संपन्न व्यक्ति को ये भ्रम होता है कि वही सर्वश्रेष्ठ है, वह सब जानता है, उसे हर कोई मानता है। उससे बेहतर कोई नहीं, उसके ऊपर कोई नहीं। - उसके आसपास मौजूद कुत्तों की चापलूसी उसके इसी भ्रम को पौषित करती है। और बदले में वो कुत्तों के पौषण का ध्यान रखता है। ये एक तरह का बारटार सिस्टम है जो युग-युगांतर से चला आ रहा है। और इस सृष्टि के विनाश तक चलता रहेगा।”

मैंने अपनी बात को किसी स्पीच की तरह कह डाला। और फिर पानी के तीन-चार घूँट लिए। मुझे लगा जैसे मैंने संसद में कोई भाषण दिया हो और अब मेरे साथी सांसद मेरे लिये मेज़ थपथपायेंगे।

“ओके! आई मीन नेवर थॉट अबाउट इट देट वे। बट स्टिल आई लव डॉग्स। एंड नॉट जस्ट मी, माय होल फ़ैमिली लव्ज़ देम। तुम्हारी इस स्पीच से मेरी सोच नहीं बदलने वाली। समझे न।” उसने लगभग चेतावनी के स्वर में कहा।

“मैं तुम्हारी सोच बदलना भी नहीं चाहता दोस्त। कहा था न - बस एक अनपॉपुलर ओपिनियन है।” मुझे उसके चेहरे पर झीना सा लालपन नज़र आया। कैफ़े की उजली पीली रौशनी में मैं उसके गालों को खिलते हुए देख रहा था। कि तभी टेबलों के बीच से जगह बनाते हुए वेटर हमारे पास पहुँच गया।

उसका रिज़ोटो और मेरा लज़ानिया सर्व हो चुका था। मगर खाना शुरू करने से पहले शायद वो कुछ कहना चाहती थी।

वो सामने देख रही थी। मगर सामने मौजूद किसी चीज़, या किसी शख़्स को नहीं। निस्संग अपनी सोच में या तो वो अपने अतीत की यादों में झांक रही थी या फिर भविष्य की कल्पनाओं में।

उस वक़्त उसकी आँखों में जैसे समय के तीनों डायमेंशन एक साथ उतर आए थे। वो कहीं भी आ-जा सकती थी। और किसी को कुछ पता नहीं चलने वाला था।

“एनीथिंग एल्स सर?” वेटर ने मुझसे पूछा। उसने कटलरी के दो सेट हमारी टेबल पर रख दिये।

“दिस वुड बी ऑल।” मैंने कहा।

वो सुदूर समय से लौट आई। उसकी आँखें अब वर्तमान में थीं। अपने रिज़ोटो पर।

“व्हाट वर यू थिंकिंग?” मैंने उसे जिज्ञासा से देखा।

“डॉग्स। अपने तीनों प्यारे कुत्तों के बारे में सोच रही थी। हैदराबाद में पापा-मम्मी एक सरकारी कॉटेज में रहते हैं। मैं यहाँ इस शहर में हूँ। मेरा भाई बैंगलोर में है। सुबह जब पापा कॉलेज निकल जाते हैं - तो मम्मी के साथ हमारे तीनों कुत्ते ही रहते हैं। उन्हें खिलाना, पिलाना, बाहर घुमाना, उनका ध्यान रखना - सब मेरी मम्मी करती हैं। और यही सब वो भी करते हैं - मम्मी के लिए।

तुम्हें पता है? कुत्ते इंसान का सुख और दुख दोनों सूंघ लेते हैं। तुम्हारी ख़ुशी में वो बच्चों से उछलते-कूदते हैं, भौंकते हैं, लौटते हैं, तुम पर चढ़ जाते हैं, तुम्हें चाटते हैं। और तुम्हारे दुख में? वो तुम्हारे साथ चुपचाप बैठे रहते हैं। एक आवाज़। एक आवाज़ भी नहीं करते। ऐसे सियाह, गमगीन सन्नाटे में जब तुम उनकी आँखों में देखोगे तो महसूस करोगे कि अगर कुछ और देर तुम दुखी रहे, तो तुम्हारे साथ बैठे कुत्ते बोल पड़ेंगे। बोल पड़ेंगे कि - हम हैं।” उसकी पलकों पर आँसू ऐसे ठहर गए जैसे पत्तियों पर ओस की बूँदें ठहर जाया करती हैं। उसका चेहरा पहले से अधिक लाल हो गया।

मेरी स्पीच पर किसी ने मेज़ नहीं थपथपाई थी। मगर उसकी काउंटर-स्पीच पर मैंने मेज़ को धीरे से थपथपा दिया।

“लाँग लिव दी डॉग्स, मैम।” मैंने रिज़ोटो की प्लेट उसके और पास सरका दी।

“यू लॉस्ट दी डिबेट।” अपने आंसुओं को टिशूपेपर से पोंछते हुए वो हंसी।

“हंड्रेड परसेंट। आई एक्सेप्ट माई डिफ़ीट।” मैंने उसकी ओर हाथ बढ़ाया। हमने हाथ मिलाया और आख़िरकार डिनर करना शुरू किया।

मैं उसे खाते हुए देख रहा था। और सोच रहा था कि अगर मैं उसकी मोहब्बत जीत सका। तो ऐसी अनगिनत हारें मुझे क़ुबूल होंगी।

रात गहराने लगी थी। चाँद के आसपास उड़ रहे काले बादल छट चुके थे। लगता था जैसे गहराती रात में कोई सुनार चाँदी भर रहा हो।

कैफ़े के ट्रांसपेरेंट दरवाज़े से उसने बाहर देखा। चाँद जैसे पोर्च में उतर आया हो और उसे बुला रहा हो। - अपनी एडमायरर को अपने पास।

उसने अपना रिज़ोटो ख़त्म किया और वेटर को इशारे से बिल दे देने को कहा। मैं अब तक अपना लज़ानिया नहीं खा सका था। मैंने उसे छोड़ देना ठीक समझा। और खाना बंद कर दिया।

“आई एम फ़ुल।” मैंने अपने सीने पर हाथ रखा और अपनी गर्दन को पीछे की ओर मोड़ते हुए एक गहरी साँस ली।

“यू आर गॉना लीव देट?” उसके माथे पर लकीरें खिंच आईं।

“यस! आई एम डन।” मैंने अपने गिलास को पानी से भरते हुए कहा।

“डोंट! गेट इट पैक्ड। घर पर खा लेना।” उसने मुझे समझाते हुए कहा।

“घर है ही कहाँ। फ्लैट है यहाँ तो।” मैं कुछ ज़ोर से बोल पड़ा। 

कभी-कभी किसी बातचीत के बीच अचानक हम कुछ ऐसा बोल जाते हैं, जिसका संबंध उस बातचीत नहीं होता। लेकिन हमारे मन को चुभ रही उस टीस से होता है, जिसके बारे में हम कभी किसी से बात नहीं करते।

“तो फ़्लैट में खा लेना सर!” वो नहीं चाहती थी कि किसी भी तरह खाने की बर्बादी हो।

“मुझे अब भूख नहीं। और फ़्लैट पर फ्रिज नहीं है। सुबह तक वैसे भी ख़राब हो जाएगा। फेंकना ही पड़ेगा। मैं फेकूँगा या ये फेंकेंगे।” वेटर हमारी टेबल के पास आया और बिल वहाँ रख कर चला गया।

इससे पहले कि वो देखे भी, मैंने बिल ले लिया। और पेमेंट कर दी। उत्तर भारतीय लड़कों के दिमाग़ में पत्थर सी स्थापित एक और आदत को मैंने उस रोज़ पहचाना।

हम दोनों टेबल से उठे और दरवाज़े की ओर बढ़ गए। वो आगे, मैं पीछे। दरवाज़ा खोलते हुए उसने एक बार टेबल पर रखे लज़ानिया को देखा। और फिर मुड़कर मुझे।

“वैरी बैड हैबिट दिस इस। खाने को इस तरह वेस्ट करना।” उसने दरवाज़ा खोला और सीढ़ियों से होते हुए नीचे कैफ़े के पोर्च में पहुँच गई। उसकी नज़रों ने मुझे एक अपराधी बना दिया था।

वो पोर्च में भी नहीं रुकी और सीधे कैफ़े के बाहर फ़ुटपाथ पर जाकर खड़ी हो गई। उस रात का पूरा चाँद वहाँ उसका इंतज़ार कर रहा था।

मैं कैफ़े की सीढ़ियों पर ही ठिठक गया। और उसे देखने लगा। - चाँद को देखते हुए। चाँद के पीछे वो, उसके पीछे मैं।

पोर्च की छत से हो चुकी बारिश का पानी सिप-सिप नीचे टपक रहा था। वहाँ रखे गमलों से पौधों की सब्ज़ ख़ुशबू उठ रही थी। कैफ़े की सीढ़ियों से फ़ुटपाथ तक का रास्ता रूपहली चाँदनी में चमक रहा था। और उसी रास्ते के अंत पर वो खड़ी थी। - अपने फ़ोन से पूरे चाँद की तस्वीरें लेते हुए। मैं वहीं उसके साथ जाकर खड़ा हो गया।

“कुछ एक ऐब तो सब में होते हैं। क्या तुम्हें कोई बुरी आदत नहीं?” मैंने उससे पूछा। वो अपलक चाँद को देखे जा रही थी।

“मम्म….नहीं।” उसने सिर्फ़ इतना कहा और ऊपर आसमान में देखते देखते ही फ़ुटपाथ से नीचे सड़क पर उतर गई।

मैंने भी फ़ुटपाथ छोड़ दी। और हम दोनों बारिश से बने चहबचों से बचते हुए, लैंप पोस्ट के उजास में चुपचाप चलने लगे। 

“तुम्हारी पहली बुरी आदत मैं होना चाहूँगा।” मैंने चलते हुए सोचा। पर बोला नहीं।

चाँद अब अपने उरूज़ पर था। सड़क किनारे लगे पेड़ ऐसे दमक रहे थे मानों हर एक की शाख़ों से कोई छोटा चाँद उभर रहा हो। हवा का बहाव थमा हुआ था। ज़मीन से उमस उठ रही थी। और हम चल रहे थे - लगभग निर्जन हो चुकी सड़क पर, पूरे चाँद की निगरानी में।

“इट्स लेट।” उसने हमारे बीच चल रहे चुप को हल्के से पीछे धकेलते हुए कहा।

“इज़ इट?” मैं दूर सड़क के अंत को देख रहा था।

“हाँ भाई! काफ़ी रात हो चुकी है। वी शुड हेड होम नाउ।” उसने निर्णायक स्वर में कहा।

“होम है ही कहाँ, फ़्लैट है। बताया तो था। घर जाने का समय हुआ करता है। फ़्लैट पर जाने का कोई समय नहीं होता।जाना है जाओ, नहीं जाना मत जाओ। किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है।” मैं अब अपने पाँवों को चलते हुए देख रहा था।

“तो क्या मेरे घर चलोगे?” वो रुक गई।

“चलूँ क्या?” मैं ठहर गया।

“चलोगे?” वो रुकी रही।

“चलूँगा।” मैं ठहरा रहा।

और प्रसिद्ध गीत के अनुसार ज़मीं का चलना मुझे महसूस हुआ।

हम दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए। और फिर आगे बढ़कर उसने एक टैक्सी रुकवा ली। टैक्सी वाला वहाँ जाने को तैयार हो गया जहां हमें जाना था। - उसके घर।

उसने टैक्सी का गेट खोला और फिर एक झलक पूरे चाँद को देखा। मैंने टैक्सी का दूसरा गेट खोला और एक क्षण को उस मौन संवाद को सुनने की कोशिश कि जो उसके और पूरे चाँद के बीच चल रहा था।

हम दोनों एक साथ अंदर बैठे। और टैक्सी चल पड़ी।

मैंने पीछे मुड़कर एक बार उस सड़क को देखा जिसपर हम चले थे। सुनसान, निश्चल - चलते पैरों के इंतज़ार में।

मैंने देखा कि सड़क पर गहराए चहबचों में कई चाँद चमक रहे हैं। और हर चाँद के पास एक बिल्ली है। जो उसमें अपने प्रतिबिंब को देख रही है।

जैसे-जैसे हमारी टैक्सी आगे बढ़ती जाती। वैसे-वैसे पीछे छूटती सड़क पर अंधकार बढ़ता जाता। पूरा चाँद हमारे पीछे हो लिया था। और हम उसकी आगवानी कर रहे थे।

हम दोनों अपनी-अपनी खिड़कियों से बाहर देख रहे थे। सकरी सड़कों के जाल से निकलकर टैक्सी अब हाईवे पर दौड़ रही थी। 

मैं फ़लकबोस इमारतों को आसमान के तल से टकराते देख रहा था। कि यकायक एक दचके से मेरा ध्यान टैक्सी में लौट आया। मैंने उसकी ओर देखा। वह खिड़की के शीशे से सर टिकाए चाँद को देख रही थी। उसके चेहरे पर ग़ज़ब का ठहराव था। मैं जिस में रह जाना चाहता था।

“बाई दी वे। मैं तुम्हारे घर तक चल रहा हूँ। तुम्हारे घर में नहीं। राइट?” वो अब भी शीशे से बाहर देख रही थी।

“राइट!” उसने म्लान सी मुस्कान के साथ कहा। उसका ध्यान भी अब टैक्सी के अंदर था।

“अगर मैंने ये सवाल न पूछा होता। तो शायद! आज मैं उसके घर में जाता, सिर्फ़ घर तक नहीं।” मैंने सोचा।

हम दोनों सामने टैक्सी की विंडशील्ड को देख रहे थे। खिड़कियाँ हम दोनों को देख रही थीं।

“आपने कहा आप हेल्थ इशूज़ की वजह से मिल नहीं पा रही थीं। और जब मैंने उनके बारे में पूछा तो आपका जवाब था कि - लंबी कहानी है। क्या है वो कहानी?” मुझे लगा मैंने कुछ ऐसा पूछ लिया है जिसका उत्तर देने में वो सहज नहीं होगी।

“लाँग बैक। आई मीन व्हेन आई वॉज़ लाइक थर्टीन-फ़ोर्टीन। वी मेट विथ ऐन एक्सीडेंट।”

“वी?” मैं कुछ घबरा गया।

“मी, माय पैरेंट्स, भाई और एक कज़िन। हम सब कार से देहरादून जा रहे थे। वी यूज्ड टू लिव इन UP उस वक़्त। उसी जर्नी के दौरान हमारी कार डिसबैलेंस होकर रोड से उतर गई। और एक पेड़ में जाके क्रैश हो गई।” वो दृश्य ब दृश्य मुझे सब बताने लगी। जैसे उसके साथ वो सबकुछ फिर घट रहा हो, जिसे वह संभवतः भुला देना चाहती है।

उसे सुनते हुए मैं उसका हाथ थामकर बैठना चाहता था। मगर मैं अपनी साँसें थामकर बैठा रहा।

“उस एक्सीडेंट में सबको चोटें आईं। सिर्फ़ मुझे नहीं। सबको लगा कि आई एम ब्लेस्ड ऑर लकी। लेकिन इन्सिडेन्स के दस-पंद्रह दिन बाद मेरे जॉज़, और सर में दर्द शुरू हुआ। वी वेंट टू ए डॉक्टर एंड गॉट टू नो दैट आई हेव माइनर फ़्रैक्चर्स। तब से अब तक आई कीप ऑन गेटिंग ट्रीटमेंट्स एंड थेरेपी सेशंस। दी पेन समटाइम्स इस अनबियरेबल” वो कुछ देर के लिये एकदम चुप हो गई। और हाथ में हाथ डाले मेरे पीछे खिड़की से बाहर देखने लगी।

“वही चोट सबसे गहरी और दर्दनाक होती है, जो नंगी आँखों से दिखाई नहीं देती।” मैं उस क्षण उसके दोनों हाथ अपने हाथ में लेना चाहता था। उसके माथे पर अपना माथा रखना चाहता था। और उससे कहना चाहता था कि - मैं हूँ। मगर क्या वो ये सुनना चाहती थी? मैं नहीं जानता।

हम उसके घर के क़रीब पहुँच गये थे। टैक्सी फिर से तंग गलियों के एक जाल में प्रवेश कर गई थी।

“क्या कहानी ख़त्म हो गई?” मैंने और सुनने की आशा में पूछा।

“घर तक के लिये इतनी ही है।” उसने अपना मुँह टैक्सी ड्राइवर की ओर कर दिया। और उससे रुक जाने को कहा। उसका घर आ गया था।

टैक्सी रिहायशी इमारतों से घिरी एक निर्जन सड़क के किनारे खड़ी हो गई। हम नीचे उतर आए और वो टैक्सी वाले को रुपये देने के लिए आगे बढ़ी।

“वेट। मैं इसी से अपने रूम तक चला जाऊँगा। वहीं आई विल पे हिम।” मैंने उसे रोकते हुए कहा।

“ओके।” उसने नज़र उठाकर चाँद को देखा - जो अब तक आसमान को आलोकित कर रहा था। और फिर उसकी निगाह एक बिल्डिंग पर ठहर गई। हम उसकी सोसाइटी के बाहर खड़े हुए थे।

“ज़रा रुकना भाई। हमें अभी और आगे जाना है।” मैंने टैक्सी वाले से कहा।

मैं उस तक पहुँचा और फिर हम उसकी सोसाइटी के गेट तक साथ चले। - चुपचाप। उस रात की तरह।

गेट पर पहुँचकर हम दोनों एक दूसरे के आमने-सामने हुए। वो मुझसे गले लगने के लिए आगे बढ़ी और मैंने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। अजीब दृश्य था। कुछ बचकाना, कुछ मासूम। हम दोनों असमंजस में पड़ गए। और फिर बस मुस्कुराकर रह गए। हमें सिर्फ़ चाँद ने देखा। और किसी ने नहीं।

वो मुड़कर अपनी सोसाइटी में जाने लगी। मैं वहीं खड़ा रहा, जहां तक हम साथ चले थे।

“व्हेन विल वी मीट अगेन?” मैंने उसके कुछ आगे चले जाने के बाद पूछा।

“आई डोंट नो।” उसने पलटकर मुझे एक झलक देखा। और चाँद के आलोक में दमकती हुई भीतर चली गई।

इसी बीच टैक्सी मेरे ठीक पीछे आकर खड़ी हो गई। मैं उसमें बैठा, और अपने फ़्लैट की जानिब जाने लगा।

बादलों की आमद से आकाश में अंधेरा घिरने लगा था। सारी रात साथ चला चाँद अब दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे उसके इंतज़ार में वहीं सोसाइटी के गेट पर ठिठक गया हो।

सड़क किनारे खड़ी गुमठियों की कच्ची छतें हवा में हिल रही थीं। पानी की बूँदें टैक्सी की छत पर उतरकर शीशों के रास्ते नीचे आ रही थीं। और मैं ये सब देखते हुए उसे सोच रहा था। - अपने पास। अपने साथ।

किसी के साथ की झूठी उम्मीद इंसान को बहुत अकेला कर देती है। मैं अचानक बहुत अकेला महसूस कर रहा था। यथार्थ में शुरू हुई एक और कहानी को पूरा करने का ज़िम्मा मेरी कल्पनाओं पर आ गया था।

मैंने खिड़की का शीशा नीचे किया और अपना सर बाहर हवा में दे दिया। मेरे बाल हवा से उलझने लगे और बारिश को चेहरे ने थाम लिया। स्ट्रीट लाइट की सफ़ेद रौशनी में मैंने उस संवाद को फिर सुना जिसका गवाह चाँद का आलोक था।

“व्हेन विल वी मीट अगेन?”

“आई डोंट नो।”

बादलों की गर्जना बढ़ने लगी। बारिश बोछार की जगह आबशार सी गिरने लगी। और तब मैंने अपना सर अंदर कर लिया। शीशा बंद किया और टैक्सी में वहाँ देखा जहां कुछ वक़्त पहले तक वो बैठी हुई थी।

उसे देखने के लिए मैंने अपना फ़ोन निकाला और उसकी इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल खोली। उसने एक नई स्टोरी अपलोड की थी। -

बारिश, हवा में झूलते पेड़, रूपहले आसमान पर पूरा चाँद, और ज़मीन पर बिल्लियाँ। उसकी स्टोरी में जैसे हमारी पूरी मुलाक़ात थी। बस! एक मैं था - जो नहीं था।

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