आरम्भ और अंत के विचार हम मुतासिर करते हैं। हम हमेशा जानना चाहते हैं कि हमारे उद्गम का कारण क्या है, और हमारा अंत कब, कैसे, कहाँ, किन परिस्थितियों में होगा। हमारे पास इन दोनों की उपक्रमों के लिए ईश्वर भी मौजूद हैं - आरम्भ के लिए श्री गणेश और अंत के लिए देवाधिदेव महादेव। हमारी यही अटल आदत मेरी समझ से हमारे बनाए सिनेमा, हमारी कहानियों, हमारी फ़िल्मों में भी अनुवादित होती आयी है। सिनेमा समाज का आईना है - यह प्रसिद्द कथन किसी से नहीं छिपा है। आप हमारी बनायी अधिकाँश फ़िल्मों को देख लें। आप उनमें एक स्पष्ट नैरेटिव, एक साफ़, सीधा, सरल, स्टोरी आर्क पाएंगे। जहाँ सब कुछ शुरू से शुरू होता है। और जहाँ हमारी निगाहें एक "हैप्पी एंडिंग" की बाट जोहती रहती हैं।
हम कोई मेहनत नहीं करना चाहते। दिमाग़ पर ज़ोर नहीं डालना चाहते। हम अपने निर्देशकों और लेखकों से ये उम्मीद करते हैं कि वे हमें हर एक सवाल का जवाब दे दें। हमें एक निष्कर्ष दे दें। एक तरह का क्लोज़र, जिसके बाद कहानी में किसी नए सिरे के खुलने की तमाम संभावनाएं ख़त्म हो जाएं। हम अपना सत्य खोजना ही नहीं चाहते। हमारी रुचि बस किसी दूसरे के सत्य को अंतिम मान लेने में है। और हमारी इसी रुचि का नतीजा है कि हम लगातार सिनेमा के असली मक़सद, असली औचित्य से दूर हो रहे हैं।
सिनेमा, या कहें कि किसी भी कला का उद्देश्य असल में यह है कि वह अपने दर्शक, पाठक या श्रोता को उसमें अपना योगदान देने के लिए आमंत्रित करे। सोचने के लिए। कल्पना करने के लिए। अपनी एक दुनिया बनाने के लिए। भोपाल के वरिष्ठ कवि उदयन वाजपयी इसे बड़ा मौज़ू उदाहरण देकर समझाते हैं - वे कहते हैं कि जब आप किसी के घर जाते हैं और मेज़ पर रखा एक कप देखते हैं तो आपके दिमाग़ में उस कप की एक छवि बन जाती है। लेकिन अगर आप किसी के घर पहुंचें और मेज़ पर सिर्फ़ एक गोलाकार दाग़ पाएं तो आपकी कल्पना का द्वार खुल जाता है - आप सोचने लगते हैं कि इस जगह पर एक कप रहा होगा। उस कप में फलां फलां चीज़ होगी, उसपर क्या चित्र बने होंगे, आदि, इत्यादि।
कोई भी कला पूर्ण और अंतिम नहीं होती। वह हमेशा व्याख्या के लिए खुली होती है। उसमें हर नज़रिये के लिए जगह होती है। जैसा कि इब्ने-इंशा ने कहा है:
“सबकी अपनी-अपनी आँखें // सबका अपना अपना चाँद।”
हाल ही मैं मैंने एक अंग्रेज़ी फ़िल्म देखी - "दी स्पेक्टैक्युलर नाउ।" और मुझे उसका अंत बहुत पसंद आए। क्योंकि असल में वहां कोई अंत है ही नहीं। फ़िल्म का नायक और नायिका एक लम्बे झगड़े के बाद एक रोज़ अपने कॉलेज की सीढ़ियों पर एक दूसरे को देखते हैं। देखते रहते हैं। और बस "ब्लैक आउट। " यह फ़िल्म ख़त्म नहीं होती। बस पलक झपकती है। और फिर आपके अंदर चलने लगती है। आगे क्या हुआ, कैसे हुआ ये सब प्रश्न आपके हो जाते हैं। लेखक और निर्देशक कहानी के भविष्य को आपको सौंपकर चले जाते हैं। और मेरी नज़र में यह रोमांचक है। ऐसी और फ़िल्में हैं - राजकुमार राव की "न्यूटन।", संजय मिश्रा की "कड़वी हवा।", एक विदेशी हॉरर फ़िल्म "वेपन्स।" आदि।
अमेरिकी कवी रॉबर्ट फ़्रॉस्ट का कथन है कि - "मैंने आज तक ऐसी कोई कविता नहीं लिखी, जिसका अंत मुझे पहले से मालूम हो। लिखना, दरअसल तलाश करना है।" और क्या ज़िन्दगी भी ऐसी ही नहीं? वह शुरुआत से शुरू नहीं होती। उसका अंत किसी को मालूम नहीं होता। वह सोच-समझकर, देखभाल कर नहीं चलती है। राहत इंदौरी का शेर यहाँ गौरतलब है कि - "लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सँभलते क्यूँ हैं // इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं। "
ज़िंदगी कोई एक्सेल शीट नहीं है। और फ़िल्मों को भी ऐसा नहीं होनी चाहिए। उन्हें बस थम जाना चाहिए। ज़िंदगी की तरह। जहाँ अचानक कोई शख़्स चला जाता है। और हम सोचते रह जाते हैं उसके ख़्वाब, उसकी ख़्वाहिशें, उसकी योजनाएँ। - वे सब उसकी न होकर उनकी हो जाती हैं - जिन्होंने उसे देखा था, जो उसके साथ रहे थे, उसके साथ थोड़ा-थोड़ा बीतते रहे थे।
जैसे कोई बच्चा अचानक रोना बंद कर देता है। एकदम से। यकसर और यकायक। जैसे एक खिड़की, एक दरवाज़ा, एक टीवी, एक रेडियो। - बंद होता है। जैसे फिल्म पान सिंह तोमर में इरफ़ान खान का किरदार गोली लगते ही मर जाता है। तुरंत। बिना किसी ड्रामे के।
सिनेमा को ऐसा ही होना चाहिए। जहाँ दर्शक उसके पीछे नहीं। उसके साथ चले - सदा।
No comments:
Post a Comment