पिछले दिनों हॉलीवुड की एक नई नवेली फ़िल्म “वेरिटी।” देखने का मौक़ा हाथ लगा। डकोटा जॉनसन और एन हैथवे जैसे कलाकारों से सजी ये फ़िल्म दो अक्टूबर को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। यह एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर/क्राइम फ़िल्म है, जिसका आधार अमेरिकी लेखिका कॉलिन हूवर की इसी नाम से प्रकाशित क़िताब है।
कहानी एक ऐसी लेखिका के बारे में है जिसका कार एक्सीडेंट हुआ है, और जिसके चलते वो अपनी लिखी क़िताबों की शुरू हुई एक सीरीज़ को पूरा नहीं कर पा रही। इसी सिलसिले को पूरा करने के लिए उसका पति एक दूसरी लेखिका को नौकरी पर रखता है। तहज़ीब हाफ़ी का शेर है - थोड़ा लिखा, ज़्यादा छोड़ दिया / आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया।
वह लेखिका उनके घर में रहने लगती है और धीरे-धीरे कुछ ऐसे रहस्य उसके सामने खुलते हैं, जिनकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी। कहानी में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं कि वहां चीज़ें हिंसक होने लगती हैं। और अंत में दर्शक एक दुखद हत्या से भी रू-ब-रू होते हैं। ये फ़िल्म भारत में 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती पर रिलीज़ हुई - ये महज़ एक संयोग है।
कहानी में जब हत्या का दृश्य दिखाया गया। तब दर्शकों में हँसी-ठिठोली का माहौल था। वे किरदारों की पीड़ा पर लगातार हँस रहे थे। मृत्यु का मज़ाक़ उड़ा रहे थे। और सच पूछिये तो मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं। मुझे आपत्ति उस पैटर्न से है - जिसे इन दिनों मैं अपने आसपास पाता हूँ। और वो ये कि इस दौर में दर्शक सिर्फ़ हँसना और हँसना चाहते हैं। उनके लिए एंटरटेनमेंट का मतलब हँसी-मज़ाक है। इससे इतर कुछ नहीं।
मुंबई के आराम नगर इलाके में आज से कुछ महीने पूर्व मैंने “ओथेलो।” नामक एक जाना-माना नाटक देखा। इसी नाटक पर निर्देशक विशाल भारद्वाज ने अजय देवगन, सैफ़ अली ख़ान और करीना कपूर को लेकर फ़िल्म “ओमकारा।” बनाई है।
शेख्सपियर के लिखे मशहूर नाटक का हिन्दी एडेप्टेशन, जिसमें मुख्य भूमिका दुर्गेश कुमार ने निभाई। दुर्गेश कुमार यानी? पंचायत सीरीज़ के प्रसिद्ध बनराकस उर्फ़ भूषण जी। जिन्होंने प्रधान। उपप्रधान। और सचिव की नाक में दम कर दिया था। वे इस नाटक में ओथेलो का किरदार निभा रहे थे और सच पूछिये तो मेरी नाक में दम कर दे रहे थे। उनका जुड़ाव एक हास्य किरदार से इतना गहरा था कि एक ट्रेजेडी आधारित नाटक में भी वे हास्य केंद्रित काम ही कर रहे थे। इस हद तक कि जब अपने साथी इयागो की चाल में फँसकर ओथेलो अपनी प्रेमिका डेस्डिमोना का क़त्ल कर देता है और फूटकर रो पड़ता है - तब भी दर्शक दीर्घा में ठहाके गूंज रहे होते हैं। उस शाम वहाँ उस सभागृह में मैंने एक ट्रेजेडी को कॉमेडी बनते देखा और ये कोई सुखद अनुभव नहीं था।
जैसे हमारे जीवन से बाक़ी सब भाव विलुप्त हो गए हों। इन दिनों हम कला के हर स्वरूप से सिर्फ़ हास्य चाह रहे हैं। विदेशी फ़िल्मों की हिन्दी डबिंग के दौरान तो यह एक स्थापित नियम सा हो गया है कि कैसे हर संवाद तो मसखरा बनाया जाए। कैसे देखने वाले को हर-हर बात पर हँसाया जाए। कोई आश्चर्य नहीं कि इन दिनों स्टैंडअप कॉमिक्स का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है। और डार्क-कॉमेडी नाम का फ़िल्मी जेनर अत्यधिक लोकप्रिय है। क्योंकि जैसा मैंने कहा - इन दिनों हम लोग सिर्फ़ हँसना चाहते हैं।
अभी बस कुछ रोज़ पहले मैं एक इंटर-कॉलेज नाटक प्रतियोगिता में पहुँचा और पाया कि वहाँ खेले गए लगभग सब नाटक हास्य केंद्रित थे। दूसरे सभी भाव। सभी रस वहाँ से भी नदारद।
रंगकर्म की दुनिया में दो मुखौटों वाला एक सिंबल। एक लोगो बड़ा मशहूर है। बहुत से नाटकों या थिएटर फ़ेस्टिवल्स में आपने उसे देखा होगा। आजकल तो व्हाट्सएप के इमोटिकॉन्स में भी वो दो मुखौटे पाए जाते हैं। उन्हें अगर आप सरसरी तौर पर भी देखें तो पाएंगे कि उनमें एक हँस रहा है तो दूसरा निराश है। हताश है। दुखी है। अफ़सोस! कि सिनेमा और थिएटर - दोनों से ही दूसरा मुखौटा ग़ायब है। जबकि हमारे समाज का यथार्थ वही है। याद आता है लेखक निर्मल वर्मा का कथन कि - सड़क और सिनेमा के बीच जो विराट अंतर भारत में है। वह अन्यत्र कहीं नहीं।
मैं यह सब कहकर इस बात की पैरवी ज़रा भी नहीं कर रहा कि हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखांत या दुर्दांत कला की संरचना करनी चाहिए। नहीं। सिनेमा का काम लोगों को एंटरटेन करना है। उन्हें उनके यथार्थ से दूर ले जाना। कल्पनाओं से उन्हें मिलवाना है। और उनका मन हल्का करना है। लेकिन केवल यही तो उसका काम नहीं। उसका काम जनता को, लोगों को आईना दिखाना भी है। उन्हें उनकी सच्चाई से अवगत कराना भी है। वो प्रसिद्ध संवाद है कि - फ़िल्में सिर्फ़ तीन चीज़ों की वजह से चलती हैं - एंटरटेनमेंट। एंटरटेनमेंट। और एंटरटेनमेंट। सही बात है। लेकिन प्रश्न ये है कि एंटरटेनमेंट का अर्थ क्या सिर्फ़ हँसते रहना है? मेरी समझ से नहीं।
बिमल रॉय की “दो बीघा ज़मीन।”, गुरुदत्त की “प्यासा।” विजय आनंद की “गाइड।” ऋषिकेश मुखर्जी की “आनन्द।”, शेखर कपूर की “मासूम।”, राम गोपाल वर्मा की “सत्या।”, आशुतोष गोवारिकर की “लगान।” और “स्वदेस।” इत्यादि, इत्यादि। - क्या ये तमाम फ़िल्में हमें एंटरटेन नहीं करती? करती हैं। लेकिन सिर्फ़ एक भाव के ज़रिए नहीं। भावों के एक ऐसे इंद्रधनुष के ज़रिए जिसमें हास्य भी है। आँसू भी। जिसमें मज़ाक़ भी है। मर्म भी। जिसमें चुभन भी है। और मरहम भी।
कैफ़ी आज़मी का लिखा गीत है कि: तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो / क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो? आँखों में नमी, हँसी लबों पर / क्या हाल है। क्या दिखा रहे हो।
और शेर हैं कि: अपनी ख़ुशियाँ खो देते हैं रोने वाले लोग / बैठे-बैठे रो देते हैं रोने वाले लोग। हँसते हैं तो हँसते-हँसते बे-हद हँसते हैं / फिर हँसते-हँसते रो देते हैं रोने वाले लोग।
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